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व्‍यापार वित्तीय पोषण का तात्‍पर्य निधि एवं मौद्रिक सहायता से होता है जिसकी एक उद्यमी को अपने व्‍यापारी संगठन से संबंधित विभिन्‍न कार्यों को पूरा करने के लिए जरुरत होती है। व्‍यापारी अवधि के हर चरण में इसकी जरुरत पड़ती है। उदाहरणार्थ, व्‍यापार शुरू करने के लिए स्‍थाई संपत्ति जैसे कि जमीन, इमारत, संयंत्र और मशीनरी आदि को अर्जित करने तथा दिन-प्रति-दिन के खर्चों (कार्यशील पूंजी) जैसे कि मजदूरी और वेतन का भुगतान करना, कच्‍ची सामग्री की खरीद करना, आदि को पूरा करने के लिए इसकी बहुत आवश्‍यकता होती है। व्‍यापार को सफलता से संचालित करने और उसका विस्‍तार करने के लिए निधियों की जरुरत उत्‍पाद के संवर्धन और विपणन; भावी उपभोक्‍ताओं को इसका वितरण करने, और फर्म के मानव संसाधन आधार के प्रबंधन के लिए होती है। इसके अलावा, व्‍यापार के बदलते हुए परिवेश में जहां प्रतिस्‍पर्द्धा बढ़ रही है, व्‍यापारी इकाई के सतत रूप से आधुनिकीकरण और उन्‍नयन के लिए अतिरिक्‍त निधियां वांछित हैं।

हालांकि उद्यम के लिए जरुरी पूंजी की राशि व्‍यापार की प्रकृति और विस्‍तार पर निर्भर करती है, लेकिन किसी भी प्रकार की औद्योगिक संगठन (चाहे वह लघु, मध्‍यम अथवा बड़ा हो) के लिए इसकी समय पर और पर्याप्‍त मात्रा में आपूर्ति किए जाना जरुरी है। इस बात को मानते हुए, भारत सरकार ने देश में एक सुव्‍यवस्थित वित्‍तीय प्रणाली विकसित की है। वित्‍तीय प्रणाली से अभिप्राय एक संस्‍थागत प्रबंध है जिसके माध्‍यम से अर्थव्‍यवस्‍था में बचतों को जुटाकर अंतिम उधारकर्ताओं/निवेशकों के बीच कारगर रूप से आबंटित कर दिया जाता है। यह प्रणाली वित्‍त बाजारों और संस्‍थाओं के एक नेटवर्क के जरिए संचालित होती है, जिन्‍हें मोटे तौर पर मुद्रा बाजार और पूंजी बाजार में वर्गीकृत किया जाता है। पहले किस्‍म का बाजार अल्‍पा‍वधि निधियों का लेन-देन करता है जबकि बाद वाला बाजार दीर्घावधि निधियों का लेन-देन करता है। मुद्रा बाजार के कार्यों के विनियमन के लिए भारतीय रिजर्व बैंक सर्वोच्‍च प्राधिकारी है। जबकि पूंजी बाजार की कार्यप्रणाली का पर्यवेक्षण भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) करता है।

भारतीय वित्‍तीय प्रणाली के प्रमुख घटक है: बैंक, वित्‍त संस्‍थाएं, गैर-बैंकिंग वित्‍त कंपनियां और जोखिम पूंजी कंपनियां और उद्यम पूंजी कंपनियां। बैंक भारत में संस्‍थागत ऋण का सबसे महत्‍वपूर्ण स्रोत हैं और इनमें राष्‍ट्रीयकृत बैंक; क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक; सहकारी बैंक; विदेशी बैकों सहित निजी क्षेत्र के बैंक शामिल हैं। राष्‍ट्रीय और राज्‍य दोनों स्‍तरों पर अनेकों वित्‍त संस्‍थाएं स्‍थापित की गई हैं जो उद्योग की विविध प्रकार की वित्‍तीय आवश्‍यकताओं को पूरा करती हैं। इनमें अखिल भारतीय विकास बैंक; विशिष्‍ट वित्‍त संस्‍थाएं, निवेश संस्‍थाएं; राज्‍य वित्‍त निगम तथा राज्‍य औद्योगिक विकास निगम शामिल हैं। इसके अलावा, गैर-बैंकिंग वित्‍त कंपनियां एक ऐसा संस्‍था समूह है जो कई प्रकार से वित्‍तीय मध्‍यस्थता का कार्य करता है जैसे कि जमा राशियां स्‍वीकार करना, ऋण एवं अग्रिम प्रदान करना, पट्टे पर देना, भाड़े पर खरीद करना, आदि। दूसरी ओर, उद्यम पूंजी लघु और मध्‍यम उद्यमों के गठन के लिए उनके विकास के प्रारम्भिक चरणों में निधियन का महत्‍वपूर्ण स्रोत है।

इस वित्‍तीय मंत्र के मद्देनजर, केंद्र और राज्‍य सरकारें उद्यमियों की जरुरतों को पूरा करने के लिए हर तरह से प्रयास कर रही हैं। ये प्रयास विभिन्‍न वित्‍तीय योजनाओं और मंत्रालयों, सरकारी और प्राइवेट बैंकों, लघु उद्योग विकास संगठन, राष्‍ट्रीय लघु उद्योग निगम लि., राज्‍य वित्‍त निगमों, आदि द्वारा प्रस्‍तुत निधियन विकल्‍पों के रूप में हैं। इस प्रकार, भारत का वित्‍तीय तंत्र बहुत मजबूत है जो देश मे व्‍यापारी इकाइयों की स्‍थापना करने के लिए एक सुदृढ़ आधार प्रदान करने में सक्षम है।

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