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राष्ट्रपति का भाषण

राष्टपति जी का 66वें स्वतंत्रंत्राता दिवस की पूर्व संध्या पर दिनांक 14 अगस्त, 2012 को राष्ट्र के नाम संदेश

मेरे प्यारे देशवासियो

हमारी स्वतंत्रता की 65वीं वर्षगांठ पर हमारे देश तथा दुनिया भर के कोने-कोने में रह रहे भारतवासियों को पहली बार संबोधित करना बड़े सौभाग्य की बात है। इस महान पद का सम्मान प्रदान करने के लिए, देशवासियों तथा उनके प्रतिनिधियों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए मेरे पास समुचित शब्द नहीं हैं, यद्यपि मुझे इस बात का पूरी तरह अहसास है कि लोकतंत्रा में सबसे बड़ा सम्मान किसी पद में नहीं बल्कि हमारी मातृभूमि, भारत का नागरिक होने में है। अपनी मां के सामने हम सभी बच्चे समान है, तथा भारत हम में से हर एक से यह अपेक्षा रखता है कि राष्ट्र-निर्माण के इस जटिल कार्य में हम जो भी भूमिका निभा रहे हैं, हम अपना दायित्व सत्यनिष्ठा, समर्पण तथा हमारे संविधान में प्रतिष्ठापित मूल्यों के प्रति अटल निष्ठा के साथ पूर्ण करें।

स्वतंत्रता दिवस के इस अवसर पर, यह याद रखना जरूरी है कि साम्राज्यों के समय के दौरान स्वतंत्रता दी नहीं जाती थी, उसे लिया जाता था। इसे, महान शख्सियतों की एक पूरी पीढ़ी ने प्राप्त किया था, जिनका नेतृत्व नियति के महामानव महात्मा गांधी ने किया था, जिन्होंने इतिहास में सबसे शक्तिशाली ताकत के विरुद्ध यह लड़ाई अटल विश्वास के साथ लड़ी। उनकी नैतिक ताकत ने राजनीतिक चिंतन की धारा ही बदल दी और उसकी अनुगूंज आज हमारे चारों ओर के महान घटनाक्रमों में सुनाई देती है। जहां, यूरोपीय उपनिवेशवाद की शुरुआत 18वीं सदी के भारत में हुई वहीं, 1947 में 'जय हिंद' के उद्घोष ने इसकी समाप्ति की घोषणा की। विजय का अंतिम उद्घोष 'जय हिंद' सुभाष चंद्र बोस द्वारा दिया गया था, जिन्हें हर एक भारतीय प्यार से 'नेताजी' के नाम से जानता है। पंडित जवाहरलाल नेहरू, बाबा साहेब अंबेडकर, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सरोजिनी नायडू तथा अन्य बहुत से लोगों ने आजाद भारत के विकास का रास्ता तैयार किया। इन असाधारण पुरुषों और महिलाओं ने हमारे कल के लिए, अपने आज को बलिदान किया। वह कल आ गया है और हमें अपने आप से एक सवाल पूछना होगा : क्या हमने एक राष्ट्र और एक समाज के रूप में, इन महापुरुषों की महान परिकल्पना का सम्मान किया है?

मैं उस समय एक बच्चा था, जब नेताजी ने ताप्ती नदी के तट पर, हरिपुरा में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 51वें अधिवेशन के राष्ट्रपति के रूप में हमें यह याद दिलाया था कि 'हमारी मुख्य राष्ट्रीय समस्याएं निर्धनता, निरक्षरता तथा बीमारी का उन्मूलन है।' उनके व्याख्यान ने मेरे घर और इसी तरह से अन्य लाखों घरों को गुंजा दिया। मेरे पिता एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे तथा उस लम्बी अवधि के दौरान, जब स्वतंत्रता एक स्वप्न सा लगता था, खुद पर अपने नेताओं पर अहिंसा की ताकत पर तथा डर पर जीत पाने वाले भारतीयों के साहस पर हमारे विश्वास ने, हमें अविचल बनाए रखा। लेकिन हमें तब यह पता था, जैसा कि अब भी है, कि स्वतंत्रता का अर्थ रोटी और स्वप्न दोनों ही है।

नेताजी तथा नेहरू जी का यह मानना था कि भारत, अपना भविष्य ऐसे तत्त्वों के संयोग, साम्यवाद, से प्राप्त कर सकता है जो कि ऊपरी तौर पर घोर विरोधी दिखाई देते हैं। उनका मानना था कि आजाद भारत, एक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए, ऐसे समुदायों, जिन्हें हिंसा के लिए भड़काया गया है, के बीच सौहार्द से प्रेरित होकर, आर्थिक समता तथा सामाजिक क्रांति के द्वारा, उपनिवेशवाद काल के बाद के विश्व के लिए एक वैकल्पिक मॉडल बन सकता है। आस्था की स्वतंत्रता, लैंगिक समानता तथा सभी के लिए न्याय के द्वारा अनुप्राणित, भारत एक आधुनिक राष्ट्र बनेगा। छोटे-मोटे अपवादों से यह बात नहीं छुप सकती कि भारत एक ऐसा ही आधुनिक देश बन रहा है: हमारे देश में कोई भी आस्था खतरे में नहीं है, तथा लैंगिक समानता के प्रति निरंतर प्रतिबद्धता हमारे समय की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है।

मेरे प्यारे देशवासियो

मैं निराशावादी नहीं हूं; मैं गिलास को हमेशा आधा भरा हुआ देखता हूं न कि आधा खाली। मैं यहां तक कहना चाहूंगा कि आधुनिक भारत का गिलास आधे से अधिक भरा हुआ है। हमारा उत्पादक श्रमजीवी वर्ग; हमारे अनुकरणीय किसान, जिन्होंने अकाल से ग्रस्त इस धरती को ऐसा देश बना दिया है जहां अन्न का जरूरत से अधिक उत्पादन होता है, हमारे कल्पनाशील औद्योगिक उद्यमी, चाहे वे निजी क्षेत्रा के हों या सार्वजनिक क्षेत्रा के; हमारे बुद्धिजीवी, हमारे शिक्षाविद् तथा हमारा राजनीतिक वर्ग, सभी ने मिल-जुलकर एक ऐसे आधुनिक राष्ट्र का निर्माण किया है जो कुछ ही दशकों में आर्थिक उन्नति तथा प्रगतिशील सामाजिक कानून के क्षेत्रा में कई सदियों की दूरी को पार कर गया है।

तब तक हम इस बात का आकलन नहीं कर सकते कि हम कितनी दूर तक पहुंचे हैं जब तक कि हम यह नहीं समझते कि 1947 में हमने शुरुआत कहां से की थी। जैसा कि जवाहरलाल नेहरू अपने व्याख्यानों और लेखों में बराबर कहा करते थे, भारत उस समय एक निर्धन देश नहीं था जब उसकी आजादी छीनी गई थी। मैं यह जोड़ना चाहूंगा कि कोई भी, हजारों मीलों की यात्राा किसी निर्धन देश पर विजय प्राप्त करने के लिए नहीं करता। जो लोग इस बात पर शंका करते हैं, वर्तमान अंतरराष्ट्रीय विद्वानों द्वारा प्रकाशित आंकड़े उनके लिए प्रमाण हैं। पलासी के निर्णायक युद्ध से सात वर्ष पूर्व 1750 में भारत में विश्व का 24.5 प्रतिशत विनिर्माण होता था जबकि युनाइटेड किंगडम में केवल 1.9 प्रतिशत। दूसरे शब्दों में, विश्व बाजार में उपलब्ध हर चार वस्तुओं में से एक वस्तु भारत में निर्मित होती थी। 1900 आते-आते भारत में विश्व का केवल 1.7 प्रतिशत विनिर्माण उत्पाद रह गया था और ब्रिटेन में यह बढ़कर 18.5 प्रतिशत हो गया था। पश्चिमी औद्योगिक क्रांति 18वीं सदी में प्रारंभिक अवस्था में थी परंतु उसी अवधि के दौरान भारत में प्रति व्यक्ति औद्योगिकरण 7 से गिरकर 1 पर पहुंच गया जबकि ब्रिटेन 10 से बढ़कर 100 पर पहुंच गया। 1900 एवं 1947 के बीच भारत की आर्थिक प्रगति एक प्रतिशत के वार्षिक औसत पर थी। इतने निचले स्थान से पहले हमने 3 प्रतिशत की विकास दर प्राप्त की और इसके बाद द्रुत गति से प्रगति की : आज, दुनिया को झकझोर देने वाले दो-दो अंतरराष्ट्रीय संकटों के बावजूद तथा राष्ट्रीय स्तर पर कुछ पिछड़ने के बावजूद, हमने पिछले सात वर्षों के दौरान 8 प्रतिशत से अधिक की औसत विकास दर प्राप्त की है।

यदि हमारी अर्थव्यवस्था ने बुनियादी क्षमता प्राप्त कर ली है तो इसे अब अगली छलांग लगाने के लिए लांचिग पैड का काम करना होगा। हमें अब दूसरे स्वतंत्रता संग्राम की जरूरत है; इस बार, यह सुनिश्चित करने के लिए कि भारत हमेशा के लिए भूख, बीमारी और निर्धनता से मुक्त हो जाए। जैसा कि मेरे प्रख्यात पूववर्ती डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने स्वतंत्रता की 18वीं वर्षगांठ के अवसर पर अपने व्याख्यान में इसी मंच से कहा था, "आर्थिक प्रगति लोकतंत्रा की कसौटियों में से एक है।"

यदि प्रगति, बढ़ती आकांक्षाओं, खासकर युवाओं, के मुकाबले पिछड़ जाती है तो रोष होना स्वाभाविक है। हम एक ऐसा देश हैं जो कि आयु और जोश दोनों में युवा होता जा रहा है, यह एक अवसर भी है और चुनौती भी। युवा ज्ञान पाना चाहते हैं जो कि उनके कौशल को बढ़ाएगा; और ऐसे अवसर चाहते हैं जो भारत को प्रथम विश्व की ओर तेजी से ले जाएंगे। उनके पास सामथ्र्य है; उन्हें मौका चाहिए। शिक्षा बीज है; और अर्थव्यवस्था उसका फल। अच्छी शिक्षा प्रदान करें; बीमारी, भूख और निर्धनता समाप्त हो जाएगी। जैसा कि मैंने अपने स्वीकृति व्याख्यान में कहा था, हमारा ध्येय होना चाहिए: ज्ञान के लिए सब और सब ज्ञान के लिए। परिकल्पना असीमित नहीं हो सकती; उसे हमारे युवाओं पर केंद्रित किए जाने की आवश्यकता है।

मेरे प्यारे देशवासियो

बाहरी माहौल के भारी दबाव के बावजूद, आज हमारी अर्थव्यवस्था अधिक लचीली और विश्वास से भरी हुई है। दो दशकों के निरंतर आर्थिक सुधारों से, ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में औसत आय और उपभोग में बढ़ोतरी हुई है। कुछेक बहुत ज्यादा पिछड़े इलाकों को, राष्ट्र की मुख्य धारा में लाने की दिशा में नई तेजी आई है। परंतु ऐसी अनेक कमियां हैं जिन्हें दूर करना जरूरी है। हरित क्रांति का प्रसार देश के पूर्वी क्षेत्रों तक किया जाना है। उच्च गुणवत्ता की अवसंरचना के सृजन में तेजी लानी होगी। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को जल्दी से जल्दी अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना होगा। बहुत कुछ किया जा चुका है, बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

इस वर्ष मानसून बेतरतीब रहा है। हमारे देश का बड़ा हिस्सा सूखे की चपेट में है, और कुछ अन्य क्षेत्रा बाढ़ से तबाह हो गए हैं। महंगाई, खासतौर से खाद्य महंगाई चिंता का विषय बनी हुई है, हालांकि हमारे पास अन्न पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है लेकिन हम उनकी, अर्थात् हमारे किसानों की दयनीय दशा की अनदेखी नहीं कर सकते, जिन्होंने विपदा के दौरान भी इसे संभव कर दिखाया है; वे जरूरत के समय राष्ट्र के साथ खड़े रहे हैं; राष्ट्र को भी उनकी मुसीबत में उनका साथ देना चाहिए।

मैं यह नहीं मानता कि हमारे पर्यावरण की रक्षा और आर्थिक विकास के बीच कोई अन्तर्विरोध है। हम तब तक सुरक्षित रहेंगे, जब तक हम गांधी जी के इस महान उपदेश को याद रखेंगे : संसार में मनुष्य की जरूरत के लिए पर्याप्त साधन हैं परंतु उसके लालच के लिए नहीं। हमें प्रकृति के साथ सौहार्द से रहना सीखना होगा। प्रकृति सदैव एक समान नहीं रह सकती, परंतु हमें प्रचुरता के दौरान उसकी भेंट को सहेजकर रखना चाहिए ताकि कभी-कभार आने वाले अभाव के दौरान हम उससे वंचित न रह जाएं।

चारों ओर फैले भ्रष्टाचार के विरुद्ध रोष तथा इस बुराई के विरुद्ध विरोध जायज है, क्योंकि यह हमारे राष्ट्र की क्षमता और शक्ति को खोखला कर रहा है। कभी-कभी लोग धैर्य खो देते हैं लेकिन यह हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं पर आक्रमण का बहाना नहीं बन सकता।

संस्थाएं हमारे संविधान के दिखाई देने वाले आधारस्तंभ हैं और अगर इनमें दरार आती है तो हमारे संविधान का आदर्शवाद कायम नहीं रह पाएगा। वे सिद्धांतों और लोगों को जोड़ने का माध्यम हैं। हो सकता है कि हमारी संस्थाएं समय के साथ पुरानी पड़ गई हों, परंतु जो बना हुआ है, उसे नष्ट करना कोई समाधान नहीं है, इसके बजाय हमें इन्हें इस ढंग से पुनर्निर्मित करना होगा ताकि ये पहले से अधिक मजबूत बनें। संस्थाएं हमारी स्वतंत्रता की रक्षक हैं।

सीमाओं पर चौकसी के समान ही देश के भीतर भी चौकसी जरूरी है; हमें अपने राजनीति, न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के उन क्षेत्रों की विश्वसनीयता को बहाल करना होगा, जहां आत्मतुष्टि, थकावट या भ्रष्टाचार के कारण परिणाम प्राप्त करने में बाधा आ रही है। लोगों को अपने असंतोष को व्यक्त करने का अधिकार है। परंतु हमें यह भी समझना चाहिए कि विधायिका से कानून को या न्यायपालिका से न्याय को अलग नहीं किया जा सकता।

जब प्राधिकारी निरंकुश हो जाते हैं तो लोकतंत्र को नुकसान पहुंचता है; परंतु जब विरोध बार-बार होते हैं तब हम अव्यवस्था को न्यौता देते हैं। लोकतंत्रा एक साझा प्रक्रिया है। हम सभी की, जीत या हार साथ-साथ होती है। लोकतांत्रिक नजरिए के लिए गरिमापूर्ण व्यवहार और विरोधी विचारों को सहन करने की जरूरत होती है। संसद अपने समय पर और अपनी गति से काम करेगी। कभी-कभी इसकी गति असहज लगती है; लेकिन लोकतंत्रा में सदैव एक न्याय का दिन, चुनाव का दिन आता है। संसद लोगों का प्राण, भारत की आत्मा है। हम इसके अधिकारों और कर्त्तव्यों को अपने जोखिम पर ही चुनौती दे सकते हैं।

मैं ऐसा चेतावनी के रूप में नहीं, बल्कि इस अनुरोध के साथ कह रहा हूं कि साधारण घटनाक्रमों के पीछे छिपे अस्तित्ववादी मुद्दों को और अच्छे ढंग से समझा जाए। लोकतंत्रा में, जवाबदेही की महत्त्वपूर्ण संस्1था स्वतंत्रा चुनावों के जरिए शिकायतों के समाधान का एक बेजोड़ अवसर प्रदान किया गया है।

हमारे राष्ट्र की स्थिरता के लिए खतरा बनी हुई, पुरानी आगें अभी पूरी तरह बुझी नहीं है, राख में अभी चिंगारी बाकी है। असम में हिंसा देखकर मुझे विशेषकर पीड़ा हुई है। हमारे अल्पसंख्यकों को सांत्वना की, सद्भावना की और आक्रामकता से बचाए जाने की जरूरत है। हिंसा कोई विकल्प नहीं है; हिंसा से और अधिक हिंसा को आमंत्राण मिलता है। असम के जख्मों को भरने के लिए, हमारे युवा और प्रिय पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा तैयार किए गए असम समझौते सहित, ठोस प्रयास किए गए हैं। हमें उन पर फिर से विचार करना चाहिए, और न्याय की भावना और राष्ट्र के हित में मौजूदा हालात के अनुसार उन्हें ढालना चाहिए। हमें एक नई आर्थिक क्रांति के लिए शांति की आवश्यकता है जिससे हिंसा के प्रतिस्पर्धात्मक कारणों को समाप्त किया जा सके।

हमारे भू-राजनीतिक परिवेश की यह एक सच्चाई है कि कुछ समस्याएं सीमाओं को भी पार कर जाती हैं। सार्क की स्थापना, 27 वर्ष पहले, संवाद के जरिए समाधान ढूंढ़ने के लिए तथा आपसी सहयोग के द्वारा ऐसी तीव्र आर्थिक प्रगति लाने के लिए की गई थी जो कि प्रव्रजन और असमान विकास जैसी समस्याओं का एक ही दीर्घकालिक समाधान है। सार्क को अपने दायित्वों को पूरा करने के लिए और अधिक सशक्त बनना होगा।

आतंकवादियों के विरुद्ध साझा लड़ाई में सार्क को एक प्रमुख माध्यम बनना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय सहयोग द्वारा इसमें बड़ी सफलता मिल सकती है। सभी सार्क राष्ट्रों को उन लोगों को सजा देने में सहयोग करना चाहिए जो मासूमों के विरुद्ध हिंसा में विश्वास करते हैं। उपमहाद्वीप में, शांति के लिए इसके अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है।

मुझे अपनी बहादुर सशस्त्र सेनाओं और पराक्रमी पुलिस बलों पर गर्व है, जिन्होंने आतंकवाद के इस खतरे के उन्मूलन के लिए, बहुत अधिक व्यक्तिगत जोखिम उठाकर इतना कुछ किया है। उनकी इसी सतर्कता से, और अधिक विध्वंस पर अंकुश लग पाया है। हम चैन से इसलिए सो पाते हैं क्योंकि वे नीरस रेगिस्तान और पहाड़ तथा जंगल; और समुद्र के गहन सूनेपन में जागते और चौकस रहते हैं। मैं उनके समर्पण और उनकी देशभक्ति को सलाम करता हूं। यह खुशी की बात है कि सशस्त्रा सेनाएं न केवल हमारे लिए शांति सुनिश्चित करती हैं बल्कि ओलंपिक में पदक विजेता भी तैयार करती हैं। मैं उन सभी को बधाई देता हूं जिन्होंने हाल ही में सम्पन्न खेलों में जीत हासिल करके या उनमें भाग लेकर राष्ट्र को गौरवान्वित किया है । हो सकता है कि ट्राफियों की संख्या अभी बहुत अधिक न हो परंतु इसमें पिछली बार के मुकाबले काफी सुधार हुआ है। चार साल बाद, जब मुझे उम्मीद है कि मैं आपको दोबारा सम्बोधित करूंगा, मुझे यकीन है कि हम पदकों की बौछार पर खुशी मना रहे होंगे।

मेरे प्यारे देशवासियो

यदि इतिहास में किसी एक व्यक्ति का नाम शांति का पर्याय है तो वह हमारी स्वतंत्रता के जनक गांधी जी हैं। भारत एक सम्पन्न देश है जहां निर्धनता बसती है; भारत की एक सम्मोहक, उन्नत सभ्यता है जो न केवल हमारी भव्य कला में, बल्कि नगरों और गांवों के रोजमर्रा के जीवन की व्यापक रचनाशीलता और मानवता में भी अपनी चमक बिखेरती है। जब इंदिरा गांधी ने सितारों तक पहुंचने की कल्पना की थी तो उनका विश्वास था कि एक पीढ़ी के बाद ये भारत की पहुंच में होंगे। परंतु राष्ट्रीय एकता और भाईचारे के वातावरण और संस्कृति के बिना न तो कोई वर्तमान हो सकता है और न ही कोई भविष्य।

मेरे प्यारे देशवासियो

आइए हम, घृणा, हिंसा और क्रोध के मार्ग का त्याग करें;
आइए, हम अपने छोटे-मोटे झगड़ों और मतभेदों को भूल जाएं।
आइए, हम अपने राष्ट्र के लिए वैसी ही श्रद्धा से काम करें, जिस प्रकार की
श्रद्धा बच्चे में मां के प्रति होती है।
आइए हम उपनिषद के इस मंत्र में अपनी निष्ठा व्यक्त करें :
ईश्वर हमारी रक्षा करें।
ईश्वर हमारा पोषण करें।
हम मिलकर उत्साह और ऊर्जा के साथ कार्य करें।
हमारा अध्ययन श्रेष्ठ हो।
हमारे बीच कोई वैमनस्य न हो।
चारों ओर शांति ही शांति हो।
शांति हमारी विचारधारा हो और प्रगति हमारा क्षितिज।

जय हिंद!