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कला और संस्कृति

लोक नृत्य

केरल लोक नृत्यों की विविधता के मामले में बहुत अमीर है। ये अत्यधिक विकसित हैं और वहां के स्थानीय लोगों के मूड को संगीत और वेशभूषा के साथ दिखाते हैं। प्राकृतिक रूप से चुप इन नृत्यों को लोगों के जीवन जीने के हिसाब से और लोगों के नृत्य करने के अनुसार ढ़ाला गया है। इन सभी लोक नृत्यों में धार्मिक रंगों को देखा जा सकता है, चाहे वे फसल के संबंध में मंचन कर रहे हों या फिर बीजों की बुवाई या त्यौहार इत्यादि, हालांकि उनकी धर्मनिरपेक्ष प्रकृति हमेशा संदेह के घेरे में होती है। सामाजिक, धार्मिक और वैवाहिक स्तर पर इन नृत्यों को वर्गीकृत करने में कठिनाई है। इनमें से कई नृत्य पुरूषों द्वारा अकेले ही मंचित किए जाते हैं, कुछ सिर्फ महिलाओं के द्वारा भी मंचित किए जाते हैं। कई नृत्य ऐसे भी हैं जिनमें पुरूष और महिलाएं साथ में नृत्य करते हैं। अधिकांश लोक नृत्य गानों के साथ मंचित किये जाते हैं जिन्हें नर्तकियों द्वारा खुद ही गाया जाता है और कभी-कभी संगीतकारों के एक समूह द्वारा भी इसे गाया जाता है। कुछ लोक नृत्य संगीत उपकरणों की संगत के साथ ही मंचित किए जाते हैं। कर्द नृत्यों में कलाकार सर्कल में होते हैं और ताली बजाते हुए नृत्य करते हैं। कभी कभी तालियों की जगह वे अपने हाथ में छोठी लाठियां लिए हुए होते हैं और उन्हें बजाते हैं। उनके रीति-रिवाज और गहने उस जगह का प्रतिनिधित्व करते हैं जहां से वे संबंध रखते हैं या आए हुए हैं। सुव्यवस्थित, सरल और आसानी से वे नृत्यों को क्रियान्वित करते हैं और उनकी आध्यात्मिक क्षमता का प्रदर्शन वाकई अद्भुत है। इन लोक नृत्यों में कलाकारों और दर्शकों में कोई अंतर नही है। अधिकांशतः सभी लोक नृत्य बहुत आसान है लेकिन इस सादगी के नीचे परिकल्पना की गहराई और अभिव्यक्तता की प्रत्यक्ष्त्ता है जो एक उच्च कलात्मकता व्यवस्था भी है।

केरल में पचास से ज्यादा लोक नृत्य है जिनमें कनियाट्टम, मुडियाट्टू, कोलम थुल्लाल, कोलकली, पूराककल्ली, वेलाकली, कामापादावुकली, कन्नीयारकली, परिचामुट्टककली, थप्पूकली, कुरूवाकली और थिरूवाथिराकली सबसे ज्यादा प्रसिद्व है।

संघा कली

इसे सस्तरकली, चतिहारकली और वतरकली के नाम से भी जाना जाता है। मूलत: यह एक सामाजिक-धार्मिक नृत्य है जो कि नांबूदरियों का बहुत ही पसंदीदा और प्रसिद्व नृत्य है, इसका प्रदर्शन मन्नत पूरी होने के पश्चात किया जाता है। संघाकली का मूल प्राचीन केरल के जिमनेशिया (कलारी) के रूप में पाया गया है जहां पर शारीरिक व्यायाम आर सैन्य प्रशिक्षण के साथ शारीरिक पद और असिक्रिडा पर विशेष ध्यान दिया जाता है। नृत्य का अंतिम चरण कुदेमुडुप्पू के नाम से जाना जाता है। यह चरित्र में मार्शल और वास्तव में युद्व अभ्यास के रूप में असिक्रिडा के शास्र के रूप में कौशल का प्रदर्शन और अन्य हथियारों के प्रयोग की तकनीक में महारात हासिल करना है।

कैकोट्टी कली / थिरूवाथिरकली

कैकोट्टीकली , जिसे थिरूवाथिरकली के नाम से भी जाना जाता है, प्रसिद्व नृत्य है, थिरूवाथिरा और ओणम जैसे त्यौहारों के मौसम में केरल की महिलाओं के द्वारा मंचित किया जाने वाला यह एक लोकप्रिय, सुंदर और सुडौल समूह नृत्य है। यह ल्यासा तत्व के साथ एक सरल और सौम्य नृत्य है जिसमें कभी कभी थंडावा तत्व का भी प्रयोग कर लिया जाता है जब मलाबार क्षेत्र के कुछ भागों में पुरष भी भाग लेते हैं। मुंडू और नीरीयाथू के साथ केरल शैली के कपडे पहनी हुई और चमेली का हार पहने हुई महिलाएं नृत्य करती हैं और साथ ही थिरूवाथिरा के मधुर गाने गाती हैं जिन्हें साहित्यिक तौर पर काफी सम्मान प्राप्त है। कोई भी एक कलाकार गीत की पहली पंक्ति गाता है और बाकि सभी कोरस के साथ तालियां बजाते हुए उसे दोहराते हैं। एक सर्कल में वामावर्त और दक्षिणावर्त घूमते हुए हर कदम पर बगल में मुडते हुए, उनकी बांहे खूबसूरत तरीके से एक साथ उपर और नीचे जाती हैं वहीं दूसरी तरफ तालियां बजती रहती हैं।

मुदियाट्टू

यह एक धार्मिक नृत्य है जो भागवत पंथ से निकला है। इसमें द्वारिका पर भागवत की विजय और महिमा को दर्शाया गया है। चरित्रों को भारी भव्य वेशभूषा, जटिल और विस्तृत और साथ ही पारंपरिक पेटिंग ओर लंबा सर आदि तरीकों से सजाया जाता है। इन सभी चारित्रिक विशेषताओं के कारण किरदार अलौकिक और अद्वितीय लगते हैं ।

दप्पू कली

मालाबार के मोफिल्स का समूह नृत्य। दस-दस की दो पंक्तियों में कलाकार। दप्पू की धुन पर प्रत्येक नर्तक बाएं हाथ को पकड़े हुए और अपने शरीर को लहराते हुए आश्चर्यजनक समन्वय के साथ कदमताल करते हैं।

कोलकल्ली

एक मिश्रित नृत्य है जिसमें महिला और पुरुष दोनों भाग लेते हैं। कलाकार एक वृताकार गोले में नृत्य करते हैं, उनके पास छोटी सी छड़ी रहती है और वह विशेष कदमताल के साथ प्रस्तुती देते हैं। नृत्य के विस्तार के साथ कलाकारों का गोलाकार आकार छोटा-बड़ा होता है। उसी तरह संगीत भी धीरे-धीरे त्वरित होता जाता है और नृत्य अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचता है।

पोकुलाउकली

इसे माराकालाट्टम के नाम से भी जाना जाता है। पैर में डंडे बांध उसके सहारे उस पर खड़े होकर नृत्य का प्रदर्शन है जिसका संबंध मंदिरों के त्यौहार से है। यहां ऐसी विषय वस्तु वाला गीत गाया जाता है जिसमें, मां दुर्गा असुरों के साथ संघर्ष करती हैं और असुर सांप और बिच्छुओं के साथ उनपर हमला करते हैं, चित्रण रहता है। तबला आदि वाद्ययंत्रों द्वारा ताल होता है।

कोठामूरी

यह उत्तरी केरल के मालवंस के बीच प्रचलित नृत्य है। पत्तों और टहनियों से बैलों की बनी प्रतिकृति को नर्तक कंधों पर लेकर नर्तकियों के पीछे चलते हैं। उनके घाघरे नारियल के पत्तों से बने होते हैं और चेंदा व किन्नी (पीतल की प्लेट) जैसे वाद्ययंत्रों के सुरताल के साथ नृत्य में गजब का आनंददायी माहौल रहता है।

पूराकल्ली

मालाबार के थियास के बीच प्रचलित यह लोकनृत्य आमतौर पर मीनम (मार्च-अप्रैल) के महीने में रीति रिवाजों के अनुसार भगवती मंदिरों में किया जाता है। पूराकल्ली के लिए विशेष तौर पर प्रशिक्षित और अनुभवों नर्तकियों की आवश्यकता होती है जो सभी तकनीकों के साथ कलारिपयात्तु, केरल में व्यायाम की प्रचलित प्रणाली, का करतब जानती हों। पारंपरिक दीप के सामने खड़े होकर कलाकार अठारह विभिन्न चरणों मे लयबद्ध प्रदर्शन करते हैं। इसमें प्रत्येक चरण को निरम कहा जाता है।

पन्ना

यह मां काली के अनुष्ठान का पारंपरिक नृत्य है। इसके लिए छोटे से अस्थायी मंदिर का निर्माण किया जाता है और उसे खूबसूरती से सजाया जाता है। पाला वृक्ष की एक टहनी लेकर 10 से 12 लोग मंदिर के इर्दगिर्द निर्धारित ताल और लय के साथ नृत्य करते हैं और ऊंची आवाज में सबके साथ जप करते हैं।

सर्पम थुलाल

केरल के अनेक प्राचीन परिवार के घरों में बने विशेष सांप मंदिरों को कवु कहा जाता है। सर्पमथुलाल आमतौर पर सांप मंदिरों वाले घरों के आंगन में प्रदर्शित किया जाता है। इसमें परिवार के धन और खुशी के लिए मन्नत मांगी जाती है। यह नृत्य समुदाय के सदस्यों द्वारा किया जाता है।

अयूप्पम विलाकु

नारियल के पत्तों और केले के डंठल व पत्तों से अनेक छोटे मंदिरों का निर्माण किया जाता है। उसके बाद अयप्पन और ववार के बीच इसे गाया जाता है। विभिन्न लय और भक्तिमय गीत की धुन के साथ दो नर्तकियां अयप्पम और ववार का श्रृंगार कर नारियल के लंबे पत्ते और तलवार के साथ इसका प्रदर्शन करती हैं।

परिचमुतु कली

यह युद्ध आधारित लोक नृत्य है जिसका आरंभ उन दिनों हुआ जब कलारिपयात्तु केरल में प्रचलन में था। कलारिपयात्तु तलवारबाजी और रक्षा का एक प्रसिद्ध व्यायाम है। नर्तक अपने हाथों में तलवार और ढाल लेकर प्रदर्शन करते हैं। इस दौरान वे तलवारबाजी का अभिनय करते हुए आगे बढ़ते हैं, पीछे हटते हैं और गोलाकार घूमते हैं। हर समय वे तलवार से वार और ढाल से बचाव करते हैं।

कावादियट्टम

मुख्यतः उन मंदिरों में इसका प्रदर्शन किया जाता है जब भगवान सुब्रहमनिया के सामने मन्नत की भेंट दी जाती है। यहां कई नर्तक पीले या गुलाबी कपड़ों में होते हैं और पूरे शरीर पर राख पोत कंधे पर कवाडी रखकर उडुकु, चेंदा आदि वाद्ययंत्रों के धुन पर एक पंक्ति में लयबद्ध नृत्य करते हैं। इसके लिए कभी कभी नागस्वरम का भी इस्तेमाल किया जाता है।

भद्रकाली थुलाई

यह देवी भद्रकाली की भक्ति में समर्पित है। फसलों की कटाई के बाद खेतों में विशेष पंडाल बनाए जाते हैं और नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है। यह तैयारी के बाद कई चरणों में होती है।

वेला काली

नायर समुदाय का रण नृत्य। इसमें केरल के प्राचीन युद्धों में अपनी वीरता और क्रूरता को दर्शाया जाता है। कलाकार चमकती तलवार और ढाल के साथ आकर्षक कपड़ों में सजकर ऊर्जा और ताकत का प्रदर्शन करते हुए नृत्य करते हैं। नृत्य बुराई पर अच्छाई की जीत के साथ समाप्त होता है।

पुराट्टु

लकड़ी पुराट्टु का मतलब है सीमा और नकल। यह एक हास्य लोक नाटक है जिसमें कई पात्र होते हैं जैसे चेतियर, चिराचि, कुरावन और कुराती और ये बड़ी चतुराई के साथ लोगों को हंसाते हैं।

कामपाडवु काली

यह एक युद्ध नृत्य है जो प्राचीन अतीत की विरासत है। यह नृत्य वृताकार में प्रदर्शित किया जाता है और नर्तकियां युद्ध के क्षणों का रूप देती हैं। समूह में कई विविधताएं होती है और शक्ति और उत्तम लय की भी उत्कृष्टता रहती है।

अमनाट्टम

अमन एक खोखले धातु की गेंद होती है जिसमें कई धातु के टुकड़े होते हैं। महिलाएं अमनाट्ट नृत्य को प्रस्तुत करती हैं जिसमें चार से चौबीस अमन का उपयोग होता है जो बिना गिराए एक दूसरे के तरफ फेंके और लपके जाते हैं।

थुक्कम

देवता की पूजा के बाद प्रदर्शक को एक पहिएदार मंच दिया जाता है जिसपर उठोलाकम जैसा एक स्तंभ होता है। उठोलाकम के एक छोर पर एक हुक होता है जो नर्तकी की पीठ से जुड़ी होती है। यह छोर ऊपर उठता है। उठोलाकम को उठाकर नर्तकी को हवा में लगभग क्षैतिज रखा जाता है और शारीरिक भंगिमाओं और नृत्य कलाओं से मंच की तीन बार परिक्रमा कराते हैं।

अय्यर कली

अय्यर कली का शाब्दिक अर्थ है पांच सेट का खेल। ये असारी, मूसारी, कुरायन, थट्टन और कलासारी समुदाय के सदस्यों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इसका संबंध मंदिर त्यौहारों जैसे वेलिया, थलापोली आदि के मंचन से हैं।

पडायानी

बोलचाल की भाषा में पडायानी या पडेनी सबसे रंगीन और शानदार लोक कलाओं में से एक है जिसका संबंध दक्षिण (अलाप्पुझा, कोल्लम, कोट्टायम और पथानमथीट्टा जिलों) के कुछ मंदिरों के त्यौहार से है। पडायनी शब्द का शाब्दिक अर्थ है सैन्य संरचना या सेना की पंक्ति है लेकिन इस लोक कला में हम मुख्य रूप से विशाल मुखौटा या विभिन्न आकार रंग, और डिजाइनों के कोलम देखते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण कोलम पडायनी प्रदर्शन भैरवी (काली), कोलम (मृत्यु के देवता), यक्षी (परी), पक्षी (चिडियां), आदि में प्रस्तुत किया जाता है।

थिवाटु

यह भद्रकाली मंदिर में प्रदर्शित किया जाना वाला एक भक्ति भेंट है। प्रदर्शन करने वाले समूह को थिवाटुनिस कहते हैं। इसका विषय आमतौर पर भद्रकाली द्वारा डारिका को मारना रहता है। सबसे पहले भद्रकाली (जिसे कलम कहते हैं) की प्रस्तुती होती है जिसमें पांच विभिन्न प्रकार के रंगों की शक्ति दर्शाई जाती है। तब नर्तकियां भगवती के रूप में विशेष साजसज्जा के साथ प्रस्तुति देती हैं।

भूतम थुलाई

इसके पीछे धारणा यह है कि भगवान शिव के सहायक शैतान (भूतम) इसे देखने के आ रहे हैं और मंदिर त्यौहारों का आनंद लेंगे। भूतम की अजीब भेषभूषा होती है जो रंगीन और दिलकश होती है। गोल आंखें, ऊंची नाक, लंबी जीभ, लहराते काले बाल और ओवरकोट में सभी नर्तकियां अलौकिक दिखाई पड़ती हैं।

कोल्लम थुलाई

यह एक पारंपरिक रस्म है जिसमें आमतौर पर बुरी आत्माओं की वजह से होने वाली परेशानियों से छुटकारा पाने का प्रदर्शन किया जाता है। इसमें कई पात्र होते हैं जो घृणित मेकअप सिंगों वाले सिर के साथ नृत्य करते हैं।

थियम

थियम, जिसे कालीअट्टम के नाम से भी जाना जाता है, प्राचीन सामाजिक धार्मिक रस्म है जो केरल में अतिप्राचीन काल से मनाया जाता है। कालीअट्टम शब्द का मतलब है काली के लिए पवित्र नृत्य प्रदर्शन। कालीअट्टम को कभी कभी थियट्टम से भी संबोधित किया जाता है क्योंकि प्रत्येक थिरा या गांव में इसका विधिवत प्रदर्शन होता था। यह नाम बताता है कि काटिअट्टम धार्मिक और सामाजिक महत्व का विशेष त्यौहार था।

प्राचीन समय में केरल के हर गांव का अपना सामान्य मंदिर था जिसे कवु कहा जाता था और इसके सामने कालीअट्टम का प्रदर्शन अनिवार्य था। काली शब्द का अर्थ मलयालम में सुरक्षा है और कालीअट्टम का महत्व सामाजिक या पारिवारिक सुरक्षा के लिए पवित्र नृत्य भी हो सकता है।

द्रविड उग्र देवी के उपासक थे जिन्हें कोट्टावई कहा जाता है। इस देवी को संतुष्ट करने के लिए एक अजीब नृत्य का प्रदर्शन किया गया था। ऐसा कहा जाता है कि पुराने कोट्टावई नृत्य प्रदर्शन से ही कालीअट्टम की नींव पड़ी। केरल मुख्य रूप से शक्ति (भगवती) के उपासकों की भूमि है और कालीअट्टम बाद में सामाजिक संरचना का अभिन्न अंग बन गया।

केरल का उत्तरी हिस्सा, कोलाथिरी (चिराकल राजा) का प्राचीन राज्य, जिसे कोलाथिरिन के नाम से जाना जाता है, विशेष रूप से काली पूजा का गढ़ है। इसलिए यह कोलाथुनाद (उत्तरी मालाबार) है जहां कालीअट्टम केरल के किसी अन्य भाग की तुलना में अधिक निखरा। इसतरह कालीअट्टम की एक विस्तृत श्रृंखला विकसित और पोषित हुई। समय बीतने के साथ काली के विभिन्न पहलुओं को कोलम के विभिन्न नायक और नायिकाओं ने परिभाषित किया। इसप्रकार हम शंकराचार्य को पोट्टम दैवम, थचोली ओथेनम को पुनियातु पटाविरन, कटांगगोट मक्का को मक्कापुट्टु और कालाथिरी मिलिशिया के महान कमांडर को वयानाट्टुकुलवम के रूप में पाते हैं। संक्षेप में, कालीअट्टम कोलम स्थायी रूप और विशेष गुण है और नायक के साथ परमात्मा की पूजा काफी हद तक विधिपूर्वक की जाती है।

कालीअट्टम में प्रत्येक अभिव्यक्ति को कोलम के रूप में जाना जाता है। वास्तव में कोलम का अर्थ भगवान, देवी, नायक या नायिका का रूप या आकार है जो स्वयं के विशिष्ट रूपों और प्रत्येक रूप का अपना प्रतिनिधि पहलू है। प्रत्येक कोलम के इस पहलू को चेहरा चित्रकला में बाहर लाना एक मुश्किल शिल्प कौशल और कला का अद्वितीय काम है। कुछ कोलम परंपरा के कड़े नियमों के अनुसार अपने चेहरे को रंगने में आठ से दस घंटे का समय लेते हैं। इसीतरह मुकुट, सिर की सज्जा, स्तन कवच, बांहों के गहने, चूडियां, माला और सभी ऊनी और सूती वस्त्रों से विभिन्न आकार प्रकार से सुसज्जित कोलम को देखना आश्चर्य भरा होता है। यह कहा जाता है कि कथकली की अद्वितीय सजावट इसी से प्रेरित है।

कुराथियट्टम

कुराथि जिप्सी का सेट है जिसमें सौभाग्य बारे में एक जगह से दूसरी जगह जाता है। इस नृत्य को कुर्थीअट्टम कहा जाता है, जिसमें दो कुराथिंस नृत्य के लिए प्रवेश करते हैं। माना जाता है कि ये पात्र भगवान विष्णु और भगवान शिव का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे गीतों के माध्यम से विवाद का मंचन करते हैं और अपने पति के पराक्रम को बताते हैं। एक पक्ष में अनुकूल बात दूसरे के लिए उपहास बनती है जबकि एक उसका गुणगान करता है और दूसरा व्यंगपूर्ण निंदा करता है।

थुम्पी थुलाई

यह एक ऐसा नृत्य है जिसमें केवल महिलाएं हिस्सा लेती हैं। यह आमतौर पर ओणम त्यौहार के सिलसिले में आयोजित किया जाता है। सभी लड़कियां बेदाग ओनाकोडी पोशाक में वृताकार गोले में नृत्य करती हैं। गोले के केंद्र में कलाकार रहता है।

कुम्मी

यह केरल के महिलाओं में प्रचलित नृत्य है। नर्तकियां एक गोल घेरे में घूमते हुए नृत्य करती हैं और उनके हाथ के इशारे फसल की कटाई को दर्शाते हैं। महिलाओं में एक पसंदीदा गीत को गाती हैं और बाकी महिलाएं उसी को दोहराती हैं। प्रत्येक कलाकार नई लाइन बदलती है और जब सब थक जाते हैं तो नृत्य बंद हो जाता है।

कदुवा कली

इस नृत्य को पुलीकली के रूप में भी जाना जाता है। मुहर्रम के मौसम के दौरान इसका प्रदर्शन किया जाता है। नर्तकियां उपयुक्त वेशभूषा से बाघों का रूप बनाती हैं और एक घर से दूसरे घर जाती हैं और उडुक्कु, थकाल आदि वाद्ययंत्रों की धुन पर नृत्य करती हैं।

कनियार कली

कनियारकली सदियों पुरानी लेकिन केरल का एक प्रसिद्ध लोक नृत्य है। इसे देशथुकली के नाम से भी जाना जाता है। इसमें कलाकार लयबद्ध भक्तिमय लोकगीत असुरावदयास की धुनों पर तेजी से घुमते हुए उग्र नृत्य करते है। कहा जाता है कि देवी भगवती के सम्मान में इसे प्रस्तुत करने की परंपरा है।

पक्कनर अट्टम

यह एक ऐसी कला है जिसे बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में बड़े गर्व के साथ प्रस्तुत किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि पक्कनर अपनी धर्मपत्नी के साथ हेसेस नाम की जगह पर जाता है। जहां पर वे दोनों ढोलक की विभिन्न थापों पर एक साथ नाचते हैं। सामान्यतः इस कला का प्रदर्शन ओणम के त्योहार पर किया जाता है।

कुथियोट्टम

इस कला का प्रदर्शन प्रायः तिरूवनंतपुरम जिले में स्थित देवी के मंदिरों में किया जाता है। इसमें कलाकार ठीक उसी तरह का ताज पहने हुए होता है जैसा कि ओट्टन थुल्ल में प्रस्तुति देने वाले ने पहना होता है। साथ ही तीन अन्य कलाकार विभिन्न भावभंगिमाओं के साथ तीन अलग-अलग पात्रों के चरित्र की प्रस्तुति देते हैं। ये सभी मंच के पीछे से बजाए जाने वाले वाद्य यंत्रों की धुन पर ताल से ताल मिलाकर नाचते हैं। इसके मंचन के दौरान सुनाई देने वाले लोकगीतों में मुख्य रूप से दुर्गा, 'पदपट्टु' और कालारिपट्टु नामक देवियों व अन्य देवी-देवताओं की स्तुति होती है। कुथियोट्टम में खासतौर पर लाल रंग के रेशमी कपड़ों का प्रस्तुति के दौरान उपयोग किया जाता है, जो रंगभूमि को अलग तरह का दृश्य प्रदान करते हैं।

थिरयाट्टम

थिरयाट्टम कला की प्रस्तुति मालाबार के मध्य भाग में कावुस त्योहार के दौरान दी जाती है। यहां थिरा शब्द का अर्थ तेज प्रकाश से है और थिरयाट्टम नृत्य में कलाकार अपना श्रृंगार करता है, वह अपनी कांतिमय आभा को और अधिक करने के लिए नारियल के कई खोलों में प्रज्जवलित अग्नि के साथ प्रस्तुति देता है। जिससे यह प्रस्तुति और अधिक चकित करने वाली बन जाती है।

ओप्पना

ओप्पना एक ऐसी लोककला है जो केरल के मुस्लिम समुदाय के लोगों में पारंपरागत रूप से प्रस्तुत की जाती रही है। इसमें गीत और नृत्य के माध्यम से महिलाएं दुल्हन का और पुरूष दूल्हे का मनोरंजन करते हैं।

मरगम कली

मरगम कली कला केरल में पहले के त्रावणकोर के साइरियन क्रिश्चिन समुदाय में काफी लोकप्रिय है। इस कला में समूह नृत्य के साथ परीचमुट्टू कली की तरह मार्शल आर्ट का प्रदर्शन किया जाता है। इस कला के प्रदर्शन में गाया जाने वाला विषय गीत संत थॉमस के जीवन चरित्र की पृष्ठभूमि का बखान करता है।

आदि वेदन

आदि वेदन एक प्राचीन लोककला है जो कि कन्नूर जिले के कुछ हिस्सों में आज भी प्रचलित है। इसमें आदि और वेदन माता पार्वती और शिव का प्रतीक होते हैं। प्रायः इन दोनों चरित्रों की भूमिका निभाने वाले कलाकार दो अलग-अलग समुदाय के होते हैं। इस कला का प्रदर्शन दिन के वक्त ही होता है।

अर्जुन नृथम

अर्जुननृथम नृत्य कला अलेप्पी और कोट्टायम जिलों में काफी लोकप्रिय है। इसकी प्रस्तुति रात के वक्त पारंपरिक ‘निलाविलक्कू’ नाम के दीपों की रोशनी में एक या दो व्यक्तियों द्वारा दी जाती है। अर्जुन पांचों पांडवों में से नृत्य कला में सबसे निपुण था, माना जाता है कि वह नृत्य और गीत के माध्यम से भद्रकाली की उपासना करता था। इस नृत्य की प्रस्तुति के दौरान पहनी जाने वाली पोशाक का निचला हिस्सा मोर के पंखों का बना हुआ होता है। इस नृत्य को "मायिलपीली थूक्कम" के नाम से भी जाना जाता है।

कुमाट्टी

कुमाट्टीकली दक्षिणी मालाबार में मुखौटा पहनकर किया जाने वाला एक लोकप्रिय नृत्य है। इसमें नर्तक लकड़ी के बने चमकीले मुखौटे पहनते हैं। ओणम के समय में इन नर्तकों का समूह मुखौटा लगाए और अपने शरीर को पत्तियों व घास से श्रृंगारित कर घर-घर जाते हैं। ये नर्तक ओनाविल्लू नाम के वाद्ययंत्र पर बंधी सूत की तार के कंपन से निकलने वाली धुन पर नाचते हैं।

कोथामूरियट्टम

इस कला का प्रदर्शन कुन्नूर जिले में किया जाता है। नर्तकों के समूह का मुखिया हर घर में जाता है और चेंदा नाम वाद्ययंत्र बजाकर गीत गाना आरंभ करता है। जबकि दो अन्य पात्र अपने चेहरे पर मुखौटा पहने एक लकड़ी में नारियल के खोल पिरोकर और उस पर पीले रंग के कपड़े का रेशमी गुच्छा बांधकर चलते हुए कुरूथोला गाते व दोहराते हुए चलते हैं। इसके साथ ही वे रास्ते पर हास्यास्पद भाव-भंगिमाएं बनाते हुए आगे बढ़ते रहते हैं। उनके इस स्वांग के चरित्र को पनियन के नाम से जाना जाता है। जबकि एक अन्य चरित्र सांड का होता है जिसमें कलाकार कपड़े से बनी आकृति को अपनी कमर पर पहनता है और बड़े ही निराले अंदाज में नाचता है।

गरूड़नथूकम

यह नृत्य उन मंदिरों में प्रस्तुत किया जाता है जहां भद्रकाली देवी स्थापित हैं। दो या तीन नर्तक गरूड़ का स्वांग रचाकर खास तरह के वाद्ययंत्र की ताल पर नाचते हैं। गरूड़ (पक्षियों का राजा) का प्रतिरूप बना कलाकार नृत्य के दौरान पंखों के छिन्न-भिन्न होने के बावजूद अपने पंजों में सांप को दबाए रखता है। वह आनंदातिरेक में अपने पंखों को फैलाकर और गोल घूमकर नाचता है।

चूज्हीक्कली

इस कला का प्रदर्शन शूरू करने के बाद भारी संख्या में कलाकार घर-घर जाकर अपनी प्रस्तुति देते हैं। चूज्ही नृत्य कला के लिए पत्तियों से बनी विशेष पोशाक नर्तकों द्वारा धारण की जाती है, जो कि उनके पूरे शरीर पर बंधी होती है। जबकि नर्तक के माथे पर दो सींगनुमा आकृति चिपकी हुई होती हैं। कलन और चित्रगुप्त काले रंग के कपड़े और मुखौटा पहनकर अपनी डारवनी मुद्राओं से उनके रास्ते में रूकावटें डालते हैं।

थालमकली (थालीकाक्काली)

यह एक ऐसी कला है जिसमें सबसे ज्यादा शारीरिक क्षमता का प्रयोग होता है। यह यहां की संस्कृति में सबसे ज्यादा प्रचलित है। मालप्पुरम जिले में इसका सबसे ज्यादा चलन है। ऐसा कहा जाता है कि इसके इतना लोकप्रिय होने की वजह थालीकेट्टू (बनावटी शादी कराने का एक तरह की रिवाज जिसमें लड़कियां जब अपनी युवावस्था में कदम रखती हैं) त्योहार के दौरान होने वाली प्रस्तुतियां हैं। थालीकेट्टू में प्रस्तुति देने वाले गोल घेरा बनाकर खड़े होकर एक सुर में गाते हैं। इसके बाद वे अपने दोनों हाथों में तश्तरियां लेकर उलझाव पैदा करने वाले ढंग से गोल-गोल घूमते हैं।

थिदमबूनृथम

केरल के उत्तरी हिस्से के कन्नूर जिले और कोज्हिकोडे जिले के कुछ भागों में यह कला काफी प्रचलित है। नाम्बूदिरिस इस नृत्य की अगुवाई करते हैं। मरार लोग एक खास तरह का वाद्ययंत्र इस अवसर पर बजाते हैं। एक नाम्बूदिरी के पास भालू थिदाम्बू होता है, कुल सात कलाकार अपने-अपने वाद्ययंत्रों के साथ, दो व्यक्ति हाथों में दीप लिए होते हैं, इस तरह कुल दस लोग इस कला की प्रस्तुति देने के लिए आवश्यक होते हैं। इस नृत्य कला की प्रस्तुति पूरी तरह से श्रृंगारित देवी की प्रतिमा के साथ दी जाती है जिसे कलाकार अपने सिर पर उठाए रहता है। नृत्य प्रस्तुति में पैरों का सही उपयोग बेहद आवश्यक है क्योंकि नर्तक को संगीत की धुन के साथ कदम ताल मिलानी होती है।

थेय्यन्नम

यह एक कर्मकाण्ड से ओतप्रोत कला है, जिसकी पुलाया और कुरावा समुदाय के लोगों द्वारा प्रस्तुति दी जाती है। थेय्यन्नम कला मावेलिकारा, पण्डालम् और अलाप्पुज्हा जिले के कुछ हिस्सों में देखने को मिलती है। जब व्यक्ति कृषि कार्य करता है तो उसकी पसंद और इस नई शुरूआत के प्रति आदर व उसे प्रोत्साहित करने के लिए यह कला होती है। वह विभिन्न फसलों की खेती करता है, तथापि धान की खेती के प्रति उसका खास रूझान होता है। जो कि थेय्यन्नम की विषय-वस्तु है।

थेक्कनम थेक्कथियम

यह पलक्कड़ और मालप्पुरम जिले में काफी लोकप्रिय है। पानर समुदाय के लोगों ने इसे इजाद किया है। उनका व्यवसाय ताड़ की पत्तियों से छातेनुमा वस्तु बनाना है। इस कला में दो चरित्र (एक पुरूष व एक महिला) और दो वाद्ययंत्र बजाने वालों की एक मण्डली होती है। इसमें पात्र गाकर संवाद करते हैं और खास तरह से हाथ-पैर चलाते हैं जिसके माध्यम से वे अपने नृत्य के सुपरिभाषित सोपानों को पूरा करते हैं।

थोल्पावाकूथू

इसे पावाकूथू और निज्हालकूथू के नाम से भी जाना जाता है। यह पलक्कड़ और पोन्नानी तालुका में काफी लोकप्रिय है। इसे परंपरागत तौर पर पुलावान्मर समुदाय के लोगों की कला माना जाता है। इसमें पावाकल या कठपुतलियां हिरण की खाल से बनी होती हैं, जो कि रामायण काल के चरित्रों को प्रस्तुत करती है। इन कठपुतलियों को मंच पर लगी एक बड़ी चादर के पीछे व्यवस्थित किया जाता है।

मगचुट्टू

तिरूवनंतपुरम और चिरायिन्किज्हू तालुका और किलिमानूर, पज्हायाकून्नूम्मल और थट्टाथूमला क्षेत्रों में यह काफी लोकप्रिय है। इसकी प्रस्तुति में आठ कलाकार शामिल होते हैं, प्रत्येक दो का एक जोड़ा होता है जो एक-दूसरे से जुड़े होते हैं और आतिशबाजी करते हुए आगे बढ़ते जाते हैं, साथ में लाठीबाजी भी होती है। यही तकनीक बारबार दोहराई जाती है। कलाकार अपने माथे पर चंदन लगाए हुए, सिर पर लाल रंग की रेशमी तौलिया बांधे, कमर पर लाल रंग का रेशमी कपड़े लपेटे और टखने पर घंटियां बांधे हुए होता है। ये सभी वस्तुएं मिलकर कलाकार की पोशाक बनाती हैं। यह सांप की आराधना और कालारिपायट्टू का मिलाजुला स्वरूप है।

मलयन केट्टू

यह कला पूरे कन्नूर जिले में खासी लोकप्रिय है। यह पूरी तरह से एक कर्मकाण्डी आयोजन होता है। खासतौर पर इसका प्रदर्शन उन महिलाओं के लिए किया जाता है जिनका गर्भपात हो चुका है और ज्योतिषियों ने जिन्हें इस कर्मकाण्ड को करने की सलाह दी है।

स्रोत: आईटी विभाग, केरल सरकार