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कला और संस्कृति

ललित कला

चित्रकला

केरल में चित्रकला की परंपरा रही है और मंदिरों, महलों व चर्चों में भित्ति चित्र इसके सबूत हैं। थिरूनानदिक्करन (अब कन्याकुमारी जिले में) और थिरूवानचिकुलम के भित्ति चित्र पहले से केरल के नमूनों में गिने जाते रहे हैं। इनका निर्माण 9वीं से 12वीं सदी के बीच हुआ हैं और इनमें से ज्यादातर भित्ति चित्रों को केरल के मंदिरों में देखा जा सकता है जो 15वीं सदी के बाद के भी हैं।

श्री पद्मनाभ मंदिर तिरुवनंतपुरम के भित्ति चित्रों में पौराणिक विषयों का उल्लेख है और वे सभी अपनी सादगी के लिए प्रसिद्ध हैं। 17वीं से 18वीं सदी के बीच राज्यों से इन्हें पूरा संरक्षण मिला। त्रिकोदीथनम का विष्णु मंदिर, इथुमनुवर और वाईकॉम का शिव मंदिर, सुब्रहमण्य मंदिर उदयनपुरम, वदकुनाथम मंदिर, त्रिचुर और कृष्ण मंदिर त्रिपागोद केरल के उन कई मंदिरों में शामिल हैं जहां अति सुंदर भित्ति चित्र उत्कृष्ट कला का नमूना प्रस्तुत करते हैं।

भित्ति चित्रों को कई स्थानों पर हिंदू धार्मिक विषयों के साथ देखा जा सकता है। पद्माभपुरम महल के सबसे ऊपरी मंजिल पर चालीस से अधिक भित्ति चित्र हैं जिनमें अनंतश्यानन, लक्ष्मीनारायण, गोपियों के साथ कृष्ण, दक्षिणामुखी के रूप में नटराज, शिकार पर सस्था आदि का चित्रण है। पिलियारा और डच पैलेस के चार अन्य हिस्सों में रामायण और हिंदू पौराणिक कथाओं से जुड़े दृश्यों का चित्रण है। कयमकुलम के कृष्णापुरम पैलेस में गजेंद्रमोक्षम का बड़ा चित्र है जिसे 18वीं सदी में बनाया गया था। पिछले समय में चेरूथुरूथी (1977) के कलामंडलम में नाट्यगृह का निर्माण किया गया है जिसमें केरल में नवीनतम भित्ति चित्रों के नमूने रखे गए हैं।

केरल के चर्चों में भी चित्र ईसाई पौराणिक कथाओं के दृश्यों को दर्शाते हैं। इदापल्ली और वेचुर के चर्चों में अविवाहित मैरी के चित्र भक्तों के लिए विशेष धार्मिक महत्व के हैं। चेपड़ के परंपरागत सीरियाई चर्चों में दिलचस्प भित्ति चित्र हैं। कंजुर चर्च के बाहरी दीवारों पर भी विशाल भित्ति चित्र हैं जिसमें लड़ाई के एक दृश्य में टीपू सुल्तान की सेना और ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के बीच युद्ध का चित्रण किया गया है।

त्रावणकोर के महान शासक, स्वाति तिरुनल के उदार संरक्षण में चित्रकारी को बढ़ावा मिला। मदुरै के एक प्रतिष्ठित चित्रकार अलागिरि नायडू के बनाए चित्र से न्यायालय को सजाया गया है। उन्होंने किलीमानौर के शाही परिवार के राजा रवि वर्मा को चित्रकला का प्रशिक्षण दिया था। प्रसिद्ध यूरोपीय तैल चित्रकार थियोडोर जेसन ने भी राजा रवि वर्मा को तैल चित्रकला की जानकारी दी और उन्हें अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि दिलाने में सहायता की। राजा रवि वर्मा द्वारा चित्रित देवी देवताओं के असंख्य चित्र पूरे भारत के अधिकांश हिंदू घरों में सजे हुए हैं और लोग उनकी पूजा करते हैं। राजा रवि वर्मा की बहन मंगलाबाई तम्पूरत्ती ने भी विशेष तौर पर महिलाएं और बच्चों की तस्वीरें बनाई जिन्हें सर्वत्र सराहा गया।

आधुनिक समय में केरल में दो प्रमुख चित्रकार हुए हैं, वे हैं के. माधव मेनन और के. सी. एस. पाणिक्कर। उन्होंने पेड़-पौधे और जीव-जंतुओं के जीवन पर उत्कृष्ण चित्रण किया है। पाणिक्कर ने इस क्षेत्र में खुद की एक शैली विकसित की जो एक विरासत है।

धुलीचित्रम या पावडर ड्राइंग प्राकृतिक रंगों का उपयोग कर फर्श पर पौराणिक लोगों के चित्र बनाने की परंपरागत कला है। इसे कलाम (कलामेजुथु) कहा जाता है। कलाम की कला केरल के मंदिरों और पवित्र बागों में मिल जाती है जिसमें पांच रंगों का उपयोग कर फर्श पर काली, भगवान अयप्पा जैसे देवताओं के प्रतिनिधि का चित्रण किया जाता है। सब्जियां और पाउडर और रसायन जैसे नींबू और कार्बन पाउडर, अनाज में धान का भी उपयोग किया जाता है। यह एक पारंपरिक कला है और इसमें कौन सा रंग शरीर के किस हिस्से के लिए प्रयोग किया जाना है, कौन सी आकृति पहले बनानी है और शरीर के अंगों को किस क्रम में चित्रित करना है, इसके लिए कड़े नियम बने हुए हैं। एक बार कलाम के पूरा होने के बाद पूजा आयोजित की जाती है। इस अवसर पर पारंपरिक गीत भी गाए जाते हैं। इन गीतों को कभी लिखा नहीं गया। ये बहुत सारे गीत हैं लेकिन ये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को इसी परंपरा से आगे बढ़ते रहे हैं।

रंगो का प्रयोग : सफेद रंग के लिए पाउडर चावल और काले रंग के लिए जली हुई भूसी का प्रयोग किया जाता है। पीले रंग के लिए हल्दी पाउडर और लाल रंग के लिए नींबू और हल्दी का मिश्रण उपयोग में लाया जाता है। हरे रंग के लिए विशिष्ट पेड़ों की पत्तियों के पाउडर का उपयोग होता है। देवी के स्तन धान के शंकु आकार से बनाते हैं।

मूर्तिकला

केरल में पत्थर और लकड़ी पर मिलने वाली नक्काशी केरल के मूर्तिकारों द्वारा हासिल की गई उत्कृष्टता का परिचायक है। पत्थर पर की गई नक्काशी के आदर्श नमूने वायनाड में सुल्तान के तोपखाने और एडक्कल गुफाओं में देखने को मिलते हैं। ये गुफाएं सिर्फ मानव और पशुओं के चित्रों को ही नहीं बल्कि मानवों के उपयोग की वस्तुओं और प्रतीक चिन्हों को दर्शाती हैं। निश्चित तौर पर यह कहना आज भी मुश्किल है कि ये नक्काशी कब की गई थी। संगम काल के पूर्व के रॉक कट मंदिरों में पहले की मूर्तिकला के आदर्श नमूने मिलते हैं। इस दौर की मूर्तिकला में दक्षिण के समूह पण्डयन और उत्तर में पल्लवन का प्रभाव दिखाई पड़ता है।

पत्थरों पर बुद्ध की योगासन मुद्रा में करूमड़ी, मावेलिक्कारा, भरानिक्कावू, मारूथूरकुलन्गारा और पल्लीक्कल नामक स्थानों पर मिलने वाली छवियां केरल में मूर्तिकला का आदर्श नमूना कही जाती हैं। इस तरह माना जाता है कि यहां की मूर्तिकला पर श्रीलंका की बौद्ध कला का भी प्रभाव पड़ा था। जैन धर्म से संबंधित पार्श्वनाथ, महावीर और अन्य तीर्थांकरों की छवियां भी कल्लिल, चितारल, सुल्तान के तोपखाने, पल्लिकुन्नु आदि स्थानों पर मिलती हैं जो कि केरल की मूर्तिकला की विरासत का एक अमूल्य हिस्सा हैं।

केरल के मंदिरों में उत्कृष्ट मूर्तियां मिलती हैं, खासतौर पर पत्थरों की बनी हुई, जिन पर पंड्या, चोल और विजयनगर आदि का प्रभाव साफ दिखाई पड़ता है। मंदिर की दीवारों पर देवी-देवताओं और पशुओं की चित्रकारी, नृत्य के दृश्य व दीवारों पर बनी छोटी खिड़कियों में बनी मूर्तियां केरल के मंदिरों को विशिष्टता प्रदान करती हैं। यहां त्रिकोदिथनम विष्णु मंदिर (11वीं शताब्दी) में उस दौर के दो तरह की याज्ही चौखटें देखने को मिलती हैं जो केरल के प्राचीन नृत्य कुदैकुथु और कुदाकुथु का वर्णन करती हैं। तिरूवल्लम में परशुराम मंदिर में इन चौखटों पर हाथी और शेर जैसे जानवरों का दिलचस्प चित्रण देखने को मिलता है। कन्दियूर के शिव मंदिर में पत्थर पर पौराणिक कथाओं और मिथकों से संबंधित उत्कृष्ट मूर्तियों का चित्रण है। साथ ही हरिपद सुब्रमण्या मंदिर में हनुमान की पत्थर की भव्य मूर्ति है। श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर त्रिवेंद्रम, जनार्दन मंदिर वरकाला और शिव मंदिर वैकोम में स्थापित मूर्तियों पर विजयनगर और नायक शैली का प्रभाव साफ तौर पर दिखाई पड़ता है। श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर आज भी 18वीं शताब्दी की पत्थर की मूर्तियों के संग्रह का सबसे अच्छा केंद्र है। 18वीं शताब्दी की कुलशेखर और सिवेली मूर्तियां मूर्तिकला का सबसे उत्कृष्ट नमूना हैं। यहां पुराणों और महाकाव्यों तथा भागवथम की छोटी-छोटी कहानियों को बड़े ही शानदार ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

केरल के चर्चों ने भी यहां की मूर्तिकला को समृद्ध बनाया है। कई चर्चों में देखा जा सकता है कि विशाल ग्रेनाइट से बने क्रॉस को बेहद खूबसूरती के साथ ग्रेनाइट से ही बने मंच पर खड़ा किया गया है। उदाहरण के तौर पर कदुथुरथी (वलिअपली), चंगनचेरी कन्जूर, अन्कामली और कुरूविलन्गदू चर्च को देखा जा सकता है। सभी चर्चों में सूली पर चढ़ाए जाने का प्रतीक चिन्ह दिखाई देता है। इन चर्चों में बैप्टिस्ट फॉन्ट और बैप्टिस्म के संस्कार को दर्शाने वाली मूर्तियां मूर्तिकला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। केरल के कुछ चर्चों में फारसी क्रॉस भी मिलता है जो यहां की मूर्तिकला में खासा महत्व रखता है। यह इस प्रकार से बनाया गया है कि इसमें दो बराबर लंबाई की शिलाएं एक-दूसरे को ठीक बीचोंबीच काटती हैं, इन शिलाओं को एकदम सटीक कोण पर रखकर बनाया गया है। इस क्रॉस के अंतिम छोर पर भी फूलों की बनावट देखने को मिलती है। प्रसिद्ध फारसी क्रॉस को कदमट्टम, कदुथुरूथी, कोट्टयम, परूर और अलन्गद के चर्चों में देखा जा सकता है।

केरल के मंदिरों में लकड़ी पर की गई नक्काशी ठीक वैसी ही है जैसी की पत्थर पर की गई उत्कृष्ट नक्काशी देखने को मिलती है। लकड़ी पर की गई नक्काशी सबसे ज्यादा नामास्कारा मंडप में देखी जा सकती है। इसकी अंदर की छत पर नवग्रह और पौराणिक पात्रों के साथ समुद्री बेड़े और प्रकाश की चमक के दृश्य दिखाई पड़ते हैं। कुथमबलम मंडप भी लकड़ी पर की गई अपनी शानदार नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है, किदन्गुर और हरिपद के सुब्रमण्या मंदिर इसके अच्छे उदाहरण हैं। हालांकि लकड़ी पर की गई खूबसूरत नक्काशी यहां के और भी मंदिरों में देखी जा सकती है। इसके अलावा यहां लकड़ी के बने कोष्ठक, मूर्तिकला स्तंभ आदि भी हैं। लकड़ी पर नक्काशी के लिए महादेव मंदिर कटिनामकुलम, श्री महादेव मंदिर कवियूर, नरसिम्हा मंदिर चथन्कुलन्गरा, श्री वल्लभ मंदिर तिरूवल्ला, श्री राम मंदिर त्रिप्रायर और कृष्ण मंदिर त्रिचम्बरम आदि विख्यात हैं।

लकड़ी पर की गई नक्काशी के उत्कृष्ट उदाहरण कुछ चर्चों के दरवाजों, छतों, वेदियों आदि पर देखने को मिलते हैं। लकड़ी पर नक्काशी के लिए संत थॉमस चर्च मुलन्थुरूथी, चेरिपल्लि चर्च कदुथुरूथी, कोराट्टी और इरिन्जलाकुडा के कुछ चर्च, संत जॉर्ज चर्च, इडाप्पल्ली, और ऑल सेंट चर्च उदयमपेरूर आदि विख्यात हैं। मुलान्थुरूथी के चर्च में ईसा मसीह को लकड़ी के बर्तन में परोसा जाने वाला प्रसाद यहां का मुख्य आकर्षण है।

संगीत

नृत्य की तरह संगीत का भी उदय प्राचीनकाल के नृत्य और नाटकों से हुआ, प्राचीनकाल के मानवों द्वारा संगीत के माध्यम से पहाड़ों और जंगलों के देवी-देवताओं की आराधना की जाती थी जो कि इसके विकास का मूल था। कुथू कुदियट्टम, अष्टपदी अट्टन, कृष्णानट्टम, रामानट्टम, कत्थककली आदि कला के विकसित रूप हैं, जिन्हें संगीत ने समय के साथ और भी समृद्ध किया। एक स्वदेशी शास्त्रीय संगीत के प्रकार सोपानासंगीत का विकास केरल के मंदिरों में ही हुआ, जिसने जयदेव की गीत गोविंद और अष्टपदी की लोकप्रियता को और अधिक बढ़ाया। कत्थककली के पदों को संगीत के विद्वान इरायिम्मन थम्पी ने रचा और कुन्जन नामबिर ने तुल्लाल गीतों से केरल की संगीत संस्कृति को और ज्यादा परिष्कृत किया।

त्रावणकोर में जिस समय स्वाति तिरूनल का शासन था उस काल को केरल के संगीत का अगस्त काल भी कहा जाता है। वे संगीत के एक महान संरक्षक के तौर पर जाने जाते हैं, उन्होंने अपने समय के कई संगीतज्ञों को संरक्षण प्रदान किया। स्वयं स्वाति तिरूनल ने अपने गुरू मेरूस्वामी जिन्हें हिन्दुस्तानी और कर्नाटकी संगीत का अच्छा ज्ञान था के सान्निध्य में कई भाषाओं और लोकप्रिय रागों में कई गीत लिखे। तन्जोर के चार संगीतज्ञ वातिवेलू, पोन्नय्या, चिन्नय्या और शिवान्दन जिन्हें ‘तन्जोर चतुष्क’ के नाम से भी जाना जाता है वे अपने शासक स्वाति तिरूनल के ही दरबार में रहा करते थे। कर्नाटक संगीत में वायलिन का पहली बार प्रयोग करने का श्रेय वातिवेलू को ही जाता है। तन्जोर के इन भाईयों ने भरतनाट्यम को भी आगे बढ़ाया साथ ही उनके सान्निध्य में शासक स्वाति तिरूनल ने नृत्य के प्रकारों को मंचित करने के लिए वरनास, स्वराजित, पद और तिल्लन की रचना की। वीणा वादन के विशेषज्ञ सुब्बूकुट्टी अय्या को भी स्वाति के दरबार में स्थान मिला हुआ था।

ऊपर उल्लेखित किए गए संगीतकार स्वाति के दरबार में केरल के बाहर से आए थे, हालांकि कई स्थानीय संगीतकारों को भी संरक्षण मिला था जिनमें से शादकला गोविंद मरार का नाम सबसे आगे आता है। मरार संगीत में विलक्षण प्रतिभा का धनी था। उसने तम्बुरू में चार तानों की जगह सात तानों का समावेश किया। सिर्फ यही नहीं उन्हें एक समय में छह स्तर तक पाल्लवी गाने की अद्भूत प्रतिभा के लिए शादकला के खिताब से नवाजा गया। लेकिन स्वाति के दरबार से निकलकर मरार व्यर्थ के एक मिशन पर त्यागराज के दरबार में चला गया। त्यागराज, गोविंद मरार द्वारा रचे और गाए गए प्रसिद्ध तेलगु गीत 'एन्तरो महानुभवलू, अन्सतरिकी वंदनामू' (इस दुनिया में कई महान पुरूष हैं और मैं उन्हें नमस्कार करता हूं) से खासा प्रभावित था। दो अन्य संगीतकारों ने भी स्वाति के दरबार की शोभा बढ़ाई जिन्हें पलक्कड़ के परमेश्वर भागवतर और मलियाक्कल कृष्ण मरार के नाम से जाना जाता है। इरायिम्मन थम्पी, स्वाति तिरूनल के काफी करीबी थे, वे संगीत के विद्वान थे और राज दरबार में रहते थे, उन्होंने महाराजा के दरबार में रहकर संस्कृतिक के विकास में महती भूमिका निभाई।

केरल में संगीत की परंपरा आधुनिक समय में भी अनवरत जारी है। वर्तमान आधुनिक काल में केरल के संगीतकारों में वीणा कालयनकृषणा भागवतार, कत्थकलाशेपम अनंतरम भागवतार, पलघट मणी और चेम्बाई वैद्यनाथ भागवतार का नाम कर्नाटक संगीत को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वालों में गिना जाता है।

केरल ने अपनी विशिष्ट मंदिर कला को विकसित किया जिसमें वाद्य संगीत एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। चेंदा मेलम जिसे चेंदा, कोम्बू, कुज्हाल आदि के साथ मंदिरों में मनाए जाने वाले उत्सवों में विशेष तौर पर प्रस्तुत किया जाता है। तयम्बका केरल के शास्त्रीय संगीत का एक ऐसा टुकड़ा है जिसमें ढोल की ताल का विस्तृत प्रदर्शन शामिल है। इस प्रस्तुति के कई सत्र होते हैं और प्रत्येक सत्र का सुखात्मक और दुखात्मक अंत होता है। पंचवाद्यम एक और अनोखी कला है जिसमें पांच अलग-अलग वाद्ययंत्रों (मद्दलम, इदक्का, तिमिला, कोम्बू और इलाथलम) से संगीत निकाला जाता है, इसमें सन्कू (शंख) और कुज्हल का भी समावेश होता है। तयम्बकम में पंचवाद्यम का उपयोग किया जाता है जिसका प्रत्येक सत्र एक घंटे का होता है। नगास्वरामेलम या फिर पंडिमेलम एक ऐसा प्रकार है जिसमें वाद्य यंत्रों को मंदिरों में होने वाली पूजा या फिर शादी-विवाह के मौके पर बजाया जाता है।

सोपना संगीतम

सोपना संगीतम केरल के मंदिरों में संगीत का एक बहुत ही प्राचीन रूप है। सोपना शब्द का अर्थ है मंदिर के गर्भगृह की ओर आगे बढ़ना जिसमें संतों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भक्तिपूर्ण कहानियों की प्रस्तुतियों को ही सोपना संगीतम कहा जाता है। इसमें संगीत के नियमों से परे बिना किसी राग के आरोह और अवरोह क्रम होता है। यहां तक कि सोपना संगीतम में करीब पचास प्रकार के वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जा सकता है, जिनमें से एदक्का आमतौर पर प्रयोग में लाया जाता है।

कत्थक्कली संगीतम

कत्थक्कली का संगीत सोपना संगीत की श्रेणी में आता है। जो कि केरल में पारंपरिक रूप से विद्यमान है, यह प्रायः धीमी गति का संगीत होता है जिसकी ताल के साथ-साथ कलाकार अभिनय करता है। भागवतहार या गायक इस कला के मंचन में अहम भूमिका निभाता है। भागवतहार कत्थक्कली के प्रदर्शन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वह इसमें सिर्फ एक गायक ही नहीं बल्कि पूरी प्रस्तुति का प्रबंधक भी होता है। बीते वर्षों में कत्थक्कली के गायकों में अप्पूकुट्टन भागवतहार, थिरूविल्वामाला (1851-1930), इट्टिरवि नाम्बूथिरि (1809-1908), कन्नाप्पा कुरूप (1845-1921), कुन्जिरमन नाम्बिसन (1871-1916), कुन्जू पोधुवल (1879-1940) और कृष्णनकुट्टी भागवतहार का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। कत्थक्कली के छंदों और संगीत ने विशेष रूप से मलयालम साहित्य और संगीत के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। अट्टाक्कथा, कत्थक्कली के साहित्य का एक हिस्सा है जो मलयालम साहित्य को अलग करता है। लगभग 500 प्रकार की अट्टाक्कथाएं हैं जिनमें नालाचरित्रम अट्टाक्कथा, कीचाकवाधूम अट्टाक्कथा, दुर्योधनवधम अट्टाक्कथा आदि प्रमुख हैं। अन्य की तुलना में कत्थक्कली संगीत अधिक जटिलता लिए हुए है जिसमें विभिन्न मुद्राओं और हाथ के इशारों से कलाकार द्वारा भावनाओं की गहराई और प्रसंग का अर्थ स्पष्ट किया जाता है।

सुधा मंडलम कत्थक्कली का एक कर्मकाण्डी प्रदर्शन है जिसमें केलिकोट्टू के वादक समूह के जोरदार संगीत के साथ प्रस्तुति शुरू होती है। इसमें दो कलाकार अतिरिक्त होते हैं जो मंच के पीछे से प्रस्तुति के प्रत्येक सत्र के प्रारंभ होने से लेकर समाप्त होने तक पर्दा गिराने और हटाने का काम करते हैं। जबकि गाने वाले या भागवतहार मंच के एक ओर कोने में खड़े होकर गाते हैं, मुख्य गायक को पोन्नानी भागवतहार कहा जाता है, जबकि उसके पीछे-पीछे गाने वालों को चेंगिला कहा जाता है। उनके साथ शंकिडि भी होता है जो इलथलम यानि मंजीरे बजाता है।

स्रोत: आईटी विभाग, केरल सरकार