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केरल

प्रमुख भाषा

केरल में बोली जाने वाली प्रधान भाषा मलयालम है। केरल की उत्पत्ति भी मलयालम भाषा से मानी गई है। ऐसा माना जाता है कि यह दो शब्दों मल यानी पर्वत एवं आलय यानी भूमि से मिलकर बना है। कालांतर इसी शब्द के आधार पर यहां बोली जाने वाली भाषा को मलयालम कहा जाने लगा। यह भाषा हमारे संविधान में स्वीकृत प्रमुख भाषाओं में स्थान रखती है।

हालांकि कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मलयालम भाषा द्रविड़ों द्वारा बोली जाने वाली भाषा थी। दरअसल तमिल और मलयालम भाषा के कई शब्द समान हैं तथा उनका उच्चारण भी एक ही है। विद्वानों में भाषा को लेकर आज भी दोमत है। कुछ इसे स्वतंत्र भाषा मानते हैं तो कुछ द्रविड़ों की। वहीं कुछ का मानना है कि यह भाषा तमिल भाषा से बनी है। वैसे कहा तो यह भी जाता है कि केरल के प्रथम बिशप काल्डवेल ने मलयालम भाषा का व्याकरण तैयार किया था। उनके अलावा एआर राजा वर्मा को भी इसका जानकार कहा जाता था। हालांकि दोनों भाषाओं का इतिहास ही शताब्दियों पुराना है। भाषा और व्याकरण के आधार पर दोनों ही भाषाएं एक-दूसरे के काफी नजदीक दिखाई देती हैं।

बोलियां

मलयालम को दक्षिण द्रविड़ों की भाषा आज भी कहा जाता है। यह केरल की अधिकृत राजकीय भाषा भी है। सभी केरलवासी मलयालम को अपनी मातृभाषा मानते हैं। इस भाषा की अपनी स्वतंत्र लिपि एवं आधुनिक समृद्ध साहित्य है। मलयालम भाषा की पांच बोलियां भी हैं, जिनके माध्यम से लोग आपस में संप्रेषण करते हैं। मलयालम भाषा के ज्यादातर शब्द संस्कृति से लिए गए हैं। इस भाषा में 37 व्यंजन तथा 16 स्वर होते हैं। मलयालम भाषा की लिपि नौंवी शताब्दी से ही चली आ रही है। इसके बाद 13वीं शताब्दी में इसमें थोड़े परिवर्तन किए गए। इस लिपि को कोलेझेतु कहा जाता है, जो ग्रंध लिपि से व्युत्पन्न हुई है। मलयालम कई आयामों में द्रविण भाषा से अलग है। सबसे बड़ा उदाहरण है इसमें स्वरों का अंत। यह इंडो-आर्य भाषा के साथ पत्राचार का माध्यम जरूर हो सकती है।

अक्षर

वर्तमान में मलयालम भाषा की स्वतंत्र लिपि है, परंतु ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार यह भाषा वतेझुतु से प्रेरित थी। उस काल में चेर एवं पंड्या राज था। केरल पंद्रहवी शताब्दी की शुरुआत के तीन महीनों पहले ही अस्तित्व में आ गया था। आज मलयालम में ही पत्र, दस्तावेज तथा पुस्तकें आदि तैयार की जा रही हैं। यहां तक कि बच्चों को भी स्कूलों में यह भाषा पढ़ाई जाती है। हालांकि उन्हें तमिल और मलयालम पढ़ाने के लिए वतेझुतु अक्षरों का उपयोग भी लिया जाता है।

वतेझुतु से ही एक और लिपि का जन्म हुआ था और उसे कोलेझुतु कहते हैं। हालांकि दोनों ही भाषाओं के बीच में कोई आधारभूत अंतर नहीं है। बस एक अंतर जो कोलेझुतु को वतेझुतु से अलग करता है वह है इसके पास किसी भी ऐसे अक्षर का ना होना जिससे यू, ए या फिर ओ जैसे शब्द बनाए जा सकें। हालांकि यह भाषा सबसे ज्यादा कोचीन, मालाबार और त्रावणकोर में इस्तेमाल की जाती है।

वर्तमान में मलयालम पढ़ने एवं लिखने के लिए तीन लिपियों का इस्तेमाल किया जा रहा है और इन तीनों में ही इतनी अधिक समानता है कि किसी के लिए भी यह कठिन नहीं है। कहा जाता है कि मलयालम या कोलेझुतु से भी सरल वतेझुतु है। हालांकि इस लिपि और भाषा में क्षेत्र के अनुसार थोड़े बदलाव आसानी से देखे जा सकते हैं। राज्य के कई इलाकों में तमिल भाषा के मिलान के साथ भी मलयालम बोली जाती है। ऐसा माना जाता है दक्षिण भारत में भाषाओं की पांडुलिपियों को सातवी शताब्दी से ही संरक्षित करके रखने का चलन था। मणिप्रवल का साहित्य इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

साहित्य

मलयालम भाषा लगभग तीस लाख लोगों की मातृभाषा है और भारत के दक्षिण पश्चिमी राज्य में द्रविण जनसंख्या सबसे ज्यादा है। मलयालम को भी प्रमुख भाषा बनने में कई शताब्दियां लग गई थी। और इसका विकास आज तक सतत जारी है। हालांकि यह भाषा क्षेत्रवाद के रोग से कभी पीडित नहीं हुई। हालांकि इसके साहित्य का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। लेकिन मूल रूप से मलयालम साहित्य में द्रविड़ झलक देखने को मिलती है। गैर द्रविड़ साहित्य में संस्कृति, अरबी, फ्रेंच, पुर्तगाली तथा अंग्रेजी का प्रभाव स्पष्ट देखने को मिलता है। इसके अलावा तमिल का प्रभाव भी देखा जा सकता है। हालांकि माना जाता है कि संस्कृति से कइर भाषाएं प्रभावित हुई थीं, इसलिए मलयालम का प्रभावित होना कोई बड़ी बात नहीं है।

पुरातत्व शोध के अनुसार मलयाली साहित्य की उम्र एक हजार वर्ष पुरानी है। यह भी संभव है कि भाषा इससे भी पुरानी भी हो। हालांकि भाषाई आधार पर मलयालम को लेकर शोध कार्य आज भी जारी हैं। इसलिए अभी तक इसके इतिहास और साहित्य को लेकर कोई ठोस नतीजा नहीं मिल सका है। ऐतिहासिक तत्वों के साथ हमेशा से ही छेड़छाड़ होती रही है और संभव है कि मलयालम भी इससे अछूती नहीं रही होगी। हालांकि आधुनिक वैज्ञानिक तर्कों और आधारों पर की जा रही शोध हो सकता है कि कोई नई दिशा ही दिखा दे।

स्रोत: आईटी विभाग, केरल सरकार