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ओडिशा

ओडिशा के बारे में

ओडिशा का क्षेत्र महाराष्ट्र के प्रसिद्ध प्राचीन कलिंग से बना था। मगध के मौर्य शासक अशोक ने 261ईसा पूर्व में कलिंग पर आक्रमण किया और इतिहास में यह महान कलिंग युद्ध के नाम से जाना गया। कलिंग के लोगों और राजा प्रियदर्शन के घोर विरोध के बावजूद अशोक विजयी हुआ और इस महान युद्ध का वर्णन उसके तेरहवें शिलालेख पर उसका वर्णन किया गया। इस खूनी संघर्ष के बाद अशोक का हृदय परिवर्तित हो गया और उसने बौद्ध धर्म अपना लिया। यह उसके जीवन का अंतिम युद्ध था।

ओडिशा का इतिहास: संक्षेप में

ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी के मध्य के बाद खारावेला के साथ कलिंग का नाम और भी चर्चित हो गया, वह एक जैन अनुयायी और महान विजेता था। दूसरे अन्य महान शासक केशरी साम्राज्य और पूर्वी गंगा साम्राज्य से संबंधित थे। गंगा से गोदवरी तक फैले सामाज्य का दक्षिण-पूर्वी राज्यों जैसे जावा, बोर्नियो के बीच सामुद्रिक व्यापार समृद्धि और विकास के स्वर्ण युग आ गया। सातवीं से तेरहवीं शताब्दी के बीच कलिंग का वास्तुकला विद्यालय ने काफी विकास किया। मुक्तेश्वर मंदिर, कोर्णाक स्थित सूर्य मंदिर, लिंग राज मंदिर और पुरी का जगन्नाथ मंदिर अपने वास्तुकला के कारण पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। ब्रिटिश् शासन के पूर्व और उसके दौरान कलिंग में कई महानायकों का जन्म हुआ,जैसे बख्शी जगबंधु, समुद्र गुप्त और हर्ष शिलादित्य। प्राजना और हिहुआन-तसांग के काल में बौद्ध धर्म ने नई ऊंचाइयों को छुआ। यह प्रसिद्ध चीनी तीर्थकार पुष्पागिरी विश्वविद्यालय और रत्नागिरी-ललितगिरी-उदयगिरी के बौद्ध्‍ मठों पर अब बोलते हुए देखे जा सकते थे। आदी शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और श्री चैतन्य जैसे संतों ने पुरी जैसे धार्मिक स्थान की स्थापना की। जयदेव ने विश्वप्रसिद्ध्‍ गीत गोविंद की रचना की। ओडिशा में भक्ति मत और पंच सखा यानी श्री जगन्नाथ दास, श्री अच्चयुतानंद दास, श्री बलराम, अनंत और यसोबंत सोलहवीं शताब्दी में आया। ये लोग उस दौर में धर्म के प्रति निष्ठावान और शास्त्रों के ज्ञाता थे। कवि समर्थ उपेन्द्र भनजा, कवि सूर्य बलदेव राठा, राधानाथ राय, फकिर मोहन सेनापति, पंडित गोपाबंधु दास, पंडित नीलकंठ दास, गोदवरी मिश्रा, कालंदी चरण पाणिग्रही, सच्चिदानंद रौत्रे और कई अन्य लोगों ने ओडिशा की भाषा और साहित्य में अमूल्य योगदान दिया।उत्कल गौरव, मधुसूदन दास, महाराज कृष्ण चंद्र गजापति, श्री रामचंद्र भनाजादेव, श्री बिश्वनाथ दास, श्री नवकृष्ण चौधरी, डॉ हरेकृष्ण महाताब, श्री विजयनंद पटनायक आधुनिक ओडिशा के निर्माता थे।

ओडिशा शब्द का स्रोत

ओडिशा नाम संस्कृत के शब्द 'ओद्रा विषय' एवं 'ओद्रा देसा' से लिया गया है। ओद्रा देसा या ओर देसा का प्राचीन राज्य महानदी की घाटी और स्वर्ण रेखा नदी के निचले हिस्से तक ही सीमित था। इसके अंतर्गत वर्तमान के कटक और संबलपुर और मिदनापुर का एक हिस्सा शामिल था। यह पश्चिम में गोंडवाना, उत्तर में जंगली पहाड़ी राज्य जशपुर और सिंहभूम, पूर्व में समुद्र से और दक्षिण में गंजम से घिरा हुआ था।

राज्य की प्रशासनिक ईकाइयों का इतिहास और उसके घटकों में किए गए परिवर्तन

ओडिशा के गजापति राजाओं ने पंद्रहवीं शताब्दी में राज्य पर शासन किया, लेकिन सोलहवीं शताब्दी में विजयनगर के प्रकाश में आने के बाद राज्य का उडिया भाषी केंद्रीय क्षेत्र पतन की ओर जाने लगा और गंजाम विजेता बन गया। सत्रहवीं शताब्दी के आरंभ में राज्य के उत्तरी क्षेत्र में स्वर्णरेखा नदी को मुगल साम्राज्य के बंगाल शुभ और मराठों से मिला लिया गया था। ईस्ट इंडिया कंपनी का इरादा उडिया भाषी क्षेत्रों को एकीकृत करने का इरादा नहीं था, जिन्हें उन्होंने टुकड़ों-टुकड़ों में जीता था। ओडिशा राज्य पर पांच अलग-अलग राजनीतिक शक्तियों ने शासन किया था, जिनमें बंगाल और उससे विभाजित ओडिशा क्षेत्र, छोटा नागपुर, केंद्रीय राज्य, मद्रास और ओडिशा के सामंती क्षेत्र गढ़जात महल शामिल हैं।

1866 में ना अनका नामक अकाल के बाद 1936 में ओडिशा के भाषायी क्षेत्र का गठन भारतीय संघ के विकास के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जा सकता है। बालेश्वर के राजा बैकुंठनाथ और विचित्रनाथ दास और कलिंग के राजा के साथ गंजाम उत्कल हितबंदिनी सभा, वेंकटेश बेयू ने एकीकृत ओडिशा का पुरजोर समर्थन किया। 28 नवंबर 1874 में बड़ी संख्या में राजाओं, जमींदारों की बैठक हुई और अंततः जुलाई 1877 में उत्कल गौरब मधुसूदन दास की अगुआई में उत्कल सभा गठित हुई। उत्कल गौरब मधुसूदन दास, बिस्वनाथ कार, नंद किशोर बल और गोपाल चंद्र प्रहरजा ने प्रमुख ब्रिटिश अधिकारियों से मिलकर ओडिशा के एकीकरण से संबंधित ज्ञापन सौंपा। उत्कल गौरब मधुसूदन दास के नेतृत्व में 30 दिसंबर, 1903 को कटक में उत्कल संघ सभा का आयोजन किया गया। इन्होंने उडिया भाषी क्षेत्रों के एकीकरण में अहम भूमिका निभाई। उत्कल संघ सभा के अलावा उडिया भाषी संगठन, बालासोर राष्ट्रीय सभा, सिंहभूम का उदित क्लब, उत्कल मिलन समाज, गंजाम का उत्कल हितासिनी समाज ने भी उडिया भाषी क्षेत्रों के एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इसके विरोधियों ने गंजाम में तेलूगुओं द्वारा संचालित गंजाम डिफेंस लीग को इस उडिया आंदोलन को रोकने के लिए बुलाया।

1917 में मोंटेग्यू चेम्सफोर्ड समिति ने स्वशासन के मुद्दे को लेकर भारत का दौरा किया और अपनी रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया कि उडिया भाषियों के लिए एक प्रशासनिक ईकाई की जरूरत है और उनके लिए उप-प्रांतीय व्यवस्था का सुझाव दिया। 20 फरवरी 1920 को सच्चिदानंद सिन्हा और एबी लाथे और ब्रजसुंदर दास के साथ उडिया भाषी क्षेत्रों के एकीकरण के प्रस्ताव को इम्पीरियल कौंसिल के समक्ष पेश किया। 25 नवंबर 1921 को विश्वनाथ कार और शशिभूषण राठ ने अलग ओडिशा राज्य की मांग का रुख किया। सीएल फिलिप और एसी डफ समिति ने ओडिशा के संबंध में सकारात्मक टिप्पणी की। सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में आयोजित गोलमेज सम्मेलन के दौरान साइमन कमिशन की रिपोर्ट रखी गई। पारालाखेमुंडी के महाराजा कृष्णचंद्र गजापति नारायन देव ने इस सम्मेलन में ओडिशा का प्रतिनिधित्व किया। ओडिशा सीमा समिति का गठन किया गया और डी डोनेल इसके अध्यक्ष बनाए गए। समिति ने ओडिशा के दावों का अध्ययन किया और अंततः गंजाम राज्य के पारालाखेमुंडी, खारियर, पद्मापुर और केंद्रीय क्षेत्र में फूलझार को छोड़कर ओडिशा के मैदानी भागों और एजेंसी के क्षेत्रों को मिलाने का अदेश दे दिया गया।

17 मार्च 1933 को श्वेत पत्र का प्रकाशन हुआ, जिसमें भारतीय संविधान में संशोधन के संबंध में प्रस्ताव का उल्लेख था। इसमें दो नए राज्यों सिंध और ओडिशा के गठन की प्रस्तावना थी। पारालाखेमुंडी के महाराज, मान्यताप्राप्त उत्कल संघ सभा ने अपने प्रभावशाली तर्कों के माध्यम से संसदीय समिति को ओडिशा में जयपुर एजेंसी और पारालाखेमुंडी के क्षेत्रों के स्थानांतरण के लिए राजी कर लिया। संघ ने ओ डोनेल समिति द्वारा ओडिशा में स्थानांतरण के लिए प्रस्तावित जयपुर राज्य, जालांतर मलिहाओं और पारालाखेमुंडी राज्य के छोटे हिस्से के साथ-साथ उसके शहरी क्षेत्रों को भी ओडिशा में स्थानांतरित करने का आदेश दिया। लेकिन बंगाल और बिहार में उडिया भाषी लोगों के स्थानांतरण के संबंध में कोई भी कदम नहीं उठाया गया। इस आदेश के बाद कुल क्षेत्र 55,799 से बढ़कर 84,677 वर्ग किलोमीटर कोष्टक में 21,545 से 32,695 वर्ग मील हो गया। स्वतंत्रता से पहले अंग्रेजी शासनकाल में संसद ने भारत सरकार बिल 1935 पारित किया, जिसके अनुसार 1 अप्रैल 1936 से ओडिशा राज्य प्रशासनिक ईकाई के रूप में गठित हुआ। ओडिशा के संविधान के मुताबिक एवं भारत सरकार के आदेश 1936 के तहत निम्न क्षेत्र इसकी परिधि में आए।

मद्रास के क्षेत्र/ गंजम में एजेंसी के क्षेत्र

गंजम राज्य के गैर एजेंसी क्षेत्रों में तालुका का घुमुसुर, छत्रापुर, अस्का, सोराडा, कोडला और तालुका के उत्तर और पश्चिम क्षेत्रों की मुख्य सीमा दूसरी अनुसूचित में वर्णित किए गए थे। इसी तरह से परालखेमुंडी एस्टेट भी उत्तरी एवं पूर्वी लाइन के पास थी। इस एस्टेट में विजागापटनम और जयर एस्टेट तथा पतंगी तालुका को शामिल नहीं किया गया था।

केंद्रीय क्षेत्र यानी रायपुर जिले की खरियाल जमींदारी एवं पद्मपुर और इसके 54 गांवोः चंद्रपुर-पद्मपुर एस्टेट, सात गांव, कुआकुंडा, बदिमा, सोडा, ब्रह्मपुर, पलोसोडा, जगनी और ठाकुरपाली शामिल थे।

स्वतंत्रता के पहले ओडिशा को काफी समस्याओं से जूझना पड़ा था। काफी कोशिशों के बावजूद सभी उडिया भाषा बोलने वाले को एकसाथ लाकर प्रशासनिक ढांचा नहीं तैयार किया जा सका।

उस समय केवल छह राज्य थे, जिनमें कटक, पुरी, बालेश्वर, संबंलपुर, गंजाम और कोरापुट। पुराना अंगुल राज्य 1936 के अंगुल कानून अधिनियम और 1936 खोंडामाल्स कानून अधिनियम के तहत अंगुल और खोंडामाल्स नामक दो अलग राज्य बन गए। लेकिन प्रशासनिक उद्देश्यों के कारण अंगुल को कटक और खोंडामाल्स को गंजाम राज्य में मिला दिया गया। कटक और गंजाम के जिलाधिकारी क्रमशः इन क्षेत्रों के पूर्व जिला आयुक्त बन गए। शेष 26 राजसी राज्य पर राजाओं और महाराजाओं का शासन था और उनका कानून उनके राज्य की सीमाओं तक ही सीमित था। राज्य का शासन ब्रिटिश सरकार के नुमाइदों के अधीन था और ढीला-ढाला था। ये नुमाइदें राज्य के राजाओं से कुल आय की तय राशि लेते थे, जो नजराना कहलाता था। यह प्रक्रिया 1947 में आजादी तक चलती रही।

स्रोत: आईटी विभाग, ओडिशा सरकार